भूमिका ग्राम पंचायतों के लिए स्वच्छता से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती खुले में शौच करने (ओ डी) की प्रथा को समाप्त करने की है । गाँव के तकरीबन 65 प्रतिशत लोग खुले में शौच करते हैं जिसकी वजह से मानव मल पर्यावरण को प्रदूषित करता है । ग्रामीण परिवेश में मानव मल के उत्सर्जन से ग्रामीण समुदाय का स्वास्थ प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है । मानव मल में भारी संख्या में रोगों के कीटाणु होते हैं जिससे बीमारियाँ फैलती हैं और निम्नलिखित के माध्यम से मानव तंत्र व भोजन में इन कीटाणुओं के प्रवेश करने की प्रबल संभावना होती है: हवा मक्खियाँ द्रव पाँव उंगलियाँ खेत मवेशी मोटर वाहन एक ग्राम मानव मल में निम्नलिखित हो सकते है: 1,00,00,000 वायरस 10,00,000 बैक्टीरिया 1000 परजीवी पुटी/अंडाणु 100 परजीवी अंडे खुले में शौच करने से निम्नलिखित बीमारियाँ हो सकती है: दस्त, टाइफाइड, आँतों में कीड़े, रोहा, हुक वार्म, मलेरिया, फालेरिया, पीलिया, टिटनस आदि| खुले में शौच करने का अर्थ है.... खेतों में, वनों में, झाड़ियों में, जलाशयों के आसपास या अन्य खुले स्थानों में शौच करना| हाथों, विभिन्न सतहों, अच्छी तरह से अनुरक्षित न किए गए और अस्वच्छ शौचालयों, पशुओं से संपर्क के माध्यम से तथा खुले में शौच करने के क्षेत्रों में आने-जाने वाले वाहनों के माध्यम से कीटाणु के फैलने की संभावना रहती है । क्या केवल शौचालयों के निर्माण से समस्या का समाधान हो जाएगा? बिल्कुल नहीं, क्योंकि स्वच्छता एक आदत है और व्यवहार में परिवर्तन लाना एक जटिल प्रक्रिया है । अतीत में व्यवहार में परिवर्तन की समुचित रणनीति के बगैर केवल शौचालयों के निर्माण पर जोर देने का परिणाम यह हुआ कि शौचालयों का प्रयोग नहीं किया जाता है तथा उनका प्रयोग स्टोर रूम आदि के लिए किया जा रहा है । जरा सोचिये........ अनुमान है कि 1200 की आबादी वाले शौचालय रहित एक गाँव औसतन हर रोज 300 किलो मानव मल पैदा करता है | अवशोधित मल की वजह से आसपास के परिवेश एवं जल के प्रदूषण की मात्रा की कल्पना कीजिए | यदि हम माने कि गाँव के लोग जो खाना खाते हैं और वे जो पेय पदार्थ ग्रहण करते हैं वह 300 किलो मल के 1 प्रतिशत से प्रदूषित हो, तो वह परोक्ष रूप से दूषित भोजन के माध्यम से हर रोज एक दूसरे के मल का तकरीबन 3 ग्राम कहा रहे हैं जो एक चाकलेट के बराबर है | अनके गाँवों में यादृच्छिक (रेन्डम) भौतिक सर्वेक्षण से पता चलेगा कि परिवार में शौचालय उपलब्ध न होने या निर्मित शौचालयों का उपयोग न करने के कारण लोग खुले में शौच करते हैं । मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहारिक अवरोध परंपरागत विश्वास एवं अंधविश्वास स्थान, धन, पानी एवं जागरूकता का अभाव और शौचालयों को दोषपूर्ण डिजाईन आदि । उद्देशीय रणनीति इसलिए खुले में शौच पर रोक लगाने वाले समाज के लिए तीन उद्देशीय रणनीति आवश्यक है - समुदाय में मांग पैदा करना खुले में शौच करने की प्रथा पर रोक लगाने के लिए स्वच्छता की स्थिति, सुधार के अवसरों, विशिष्ट मुद्दों पर चर्चा करने के लिए लोगों की सक्रिय भागीदारी से ग्राम पंचायत में एक प्रतिभागितापूर्ण अभियान चलाना होगा । विभिन्न प्रतिभागितापूर्ण उपकरण जैसे कि समुदाय के नेतृत्व में पूर्ण स्वच्छता (सी.एल.टी.एस) और पूर्ण स्वच्छता के प्रति सामुदायिक दृष्टिकोण (सी.ए.टी.एस), शौचालय का निर्माण करने के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए अपनाए जा सकते हैं । स्वच्छता से संबंधी सामग्रियों की आपूर्ति सुदृढ़ करना यदि लोगों को अपने घरों में शौचालय का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया जाता है, तो अपेक्षित हार्डवेयर तक पर्याप्त पहुंच/आपूर्ति को सुनिश्चित करना होगा । सामग्रियों की आपूर्ति करने के इच्छुक एजेंसियों, व्यक्तियों, गैर सरकारी संगठनों को इसे व्यवसाय के रूप में अपनाने तथा समाज के लाभ के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । आरएमएस एवं पी.सी. आरंभ करने के लिए एन.बी.ए/एम.एस.बी, एन.आर.एल.एम एवं अन्य कार्यक्रमों के पास निधियां हैं । खुले में शौच पर रोक लगाने के लिए सामाजिक दबाव उत्पन्न करना जैसा कि खुले में शौच करना एक पुरानी आदत है, दबाव, आग्रह एवं निवेदन आदि के माध्यम से खुले में शौच न करने के लिए, सामाजिक दबाव उत्पन्न करने के लिए एक आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए। ऐसी सफल पहलों के उदाहरणों में निम्नलिखित शामिल हैं - महाराष्ट्र में सोलापुर जिला पंचायत की अध्यक्ष डॉ. निशि गंधा माली गाँवों का दौरा करती रही हैं, पंचायत सदस्यों, स्कूली बच्चों, अधिकारियों, नागरिकों से मिलती रही हैं और खुले में शौच करने पर रोक लगाने के लिए तथा शौचालयों के निर्माण की जोरदार शब्दों में वकालत करती रही हैं । उन्होंने तब तक पैरों में जूते-चप्पल न पहनने की शपथ ली है जब तक कि उनका जिला खुले में शौच रहित जिला न हो जाए । उनके प्रयासों के अपेक्षित परिणाम प्राप्त होने लगे हैं तथा अनेक ग्राम पंचायतों ने खुले में शौच पर रोक लगाने के लिए स्वच्छता कार्यक्रमों का कार्यान्वयन शुरू कर दिया है । पश्चिम बंगाल में एक स्कूली बच्चे ने गाँवों के ऐसे लोगों के नामों को चिन्हित करते हुए अपने गाँव में विशिष्ट रूप से अभिचिन्हित स्थानों पर इश्तहार लगाया जो उस स्थान पर शौच करते थे । इस नए विचार ने अपने अभियान में सफल होने में समुदाय की मदद की । पूर्ण स्वच्छता हेतु सामुदायिक दृष्टिकोण खुले में शौच करने पर प्रतिबंध के लिए एक सफल तकनीक है जिसे सामुहिक निर्णय पर पहुँचने के लिए सहजकर्त्ताओं द्वारा उपयोग में लाया जाता है । इसके घटक इस प्रकार है: क्रम.सं. प्रेरक उपकरण विवरण अपेक्षित परिणाम 1 संपर्क स्थापित करना समुदाय के साथ बातचीत शुरू करना आपसी विश्वास, सहमति एवं सहयोग का विकास करके परवर्ती गतिविधियों के लिए मंच तैयार करना। 2 शौच करने के बारे में बातचीत बातचीत के रूप में समुदाय की स्वच्छता संबंधी मान्यताओं को समझने के लिए टहलना खुले में शौच किए जाने वाले क्षेत्रों सहित स्वच्छता की स्थिति का ज्ञान । 3 मल त्याग क्षेत्रों का मानचित्रण गाँव दर गाँव स्वच्छता की स्थिति के संबंध में बड़ी तस्वीर के विश्लेष्ण में सहायता प्रदान करना समुदाय के सदस्य अपने घरों के आसपास खुले में शौच करने के क्षेत्रों के होने की समस्या का वर्णन करते हैं । 4 मल की गणना उत्पन्न होने वाले मल की मात्रा का अनुमान समुदाय के सदस्य स्वच्छता की समस्या की गंभीरता का वर्णन करते हैं । 5 प्रवाह डायग्राम उन मार्गो का वर्णन करता है जिसके माध्यम से मल, समुदाय के भोजन एवं पानी को दूषित करता है समुदाय के सदस्यों द्वारा यह अनुभूति कि किसी दूर स्थित स्थान पर खुले में शौच करने का अभिप्राय यह नहीं है कि मल से जुड़ी समस्याएं दूर हो गई हैं । 6 चिकित्सा व्यय की गणना मल प्रदुषण से उत्पन्न रोगों के उपचार की लागत की गणना की जाती है समुदाय के सदस्य स्वच्छता पर निष्क्रियता की छिपी लागतों को समझने में समर्थ होते हैं । 7 जल की गुणवत्ता का परीक्षण बैक्टीरिया से दूषित होने के बारे में विभिन्न स्त्रोतों से पानी के नमूनों का परीक्षण खुले में शौच करने की वजह से पानी के स्त्रोतों का बैक्टीरिया से दूषित होने की मात्रा के बारे में समझ पैदा होती है । नोट: ग्राम पंचायत सी.ए.टी.एस अभियान आयोजित करने के लिए ब्लॉक संसाधन केंद्र (बी.आर.सी) या जिला जल एवं स्वच्छता मिशन (डी.डब्ल्यू.एस.एम) में आई.ई.सी परामर्शदाता से संपर्क कर सकती है । ग्रामीण महिलाओं के लिए: खुले में शौच न करने तथा सफाई अपनाने का महत्व खुले में शौच न करने से “शौच मौखिक मार्ग” से जुड़े रोगों की रोकथाम होती है व सामुदायिक स्वास्थ्य में योगदान होता है । इससे महिलाओं को आत्मसम्मान, निजता एवं सुरक्षा प्राप्त होती है, महिलाओं एवं लड़कियों पर यौन हिंसा की संभावना कम होती है, ऐसी महिलाओं एवं लड़कियों की कठिनाईयां कम होती हैं जिन्हें आमतौर पर शौचालयों के अभाव में शौच करने के लिए लंबी अवधि तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, और हर स्कूल में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था होने से लड़कियों की पढ़ाई बीच में छोड़ने की दर कम होती है और उनका शैक्षिक विकास होता है । अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न हमारे गाँव में पानी का घोर अकाल है । हम किस तरह खुले में शौच करने की प्रथा को बंद कर सकते हैं तथा शौचालयों का निर्माण कैसे कर सकते है? यह सच है कि शौचालयों में मल त्याग के बाद सफाई के लिए हमें पानी की जरूरत होती है । ऐसी स्थिति में साधारण किस्म के शौचालय का निर्माण एवं प्रयोग किया जाता है, क्योंकि: ग्रामीण पैन (सिरेमिक पैन) में खड़ी ढलान (40 डिग्री) होती है जिसमें पानी की बहुत कम मात्रा में अपशिष्ट बह जाता है । यदि शौचालय के प्रयोग से पहले पैन पर कुछ पानी डाल दिया जाए, तो मल तेजी से नीचे चला जता है । खुले में शौच करने की अपेक्षा इस शौचालय का प्रयोग करने पर थोड़े ही पानी की जरूरत होती है । लोग सुरक्षित स्वच्छता की आवश्यकता महसूस करते हैं । अकालग्रस्त इलाकों में भी लोगों ने शौचालय बनवाए हैं तथा उनका नियमित रूप से प्रयोग कर रहे हैं । भले ही हम अपनी पंचायत में खुले में शौच करना बंद कर दें, प्रवासी मजदूरों द्वारा खुले में शौच करने की समस्या को कैसे दूर किया जा सकता है? प्रवासी मजदूरों द्वारा खुले में शौच करना आमतौर पर एक मौसमी समस्या है । प्रवासी मजदूरों के लिए थोड़े समय तक प्रयोग के लिए एक अस्थायी खंदक शौचालय का निर्माण किया जा सकता है । हमारे गाँव में किसी के पास भी शौचालय नहीं है, परन्तु तब भी हम सभी स्वस्थ हैं । शौचालय की आवश्यकता कहां है? खुले में शौच करने का प्रभाव न केवल संबंधित परिवार तक सीमित होता है अपितु बैक्टीरिया एवं वायरस के फैलने के कारण गाँव के अन्य लोग भी प्रभावित होते हैं । इसके अलावा, रोगों की संभावना प्रतिरक्षण के स्तर पर भी निर्भर होती है जो हर व्यक्ति में अलग-अलग होता है ।खुले में शौच करने से दस्त, टाइफाइट, पीलिया आदि जैसी बीमारियाँ फैलती है । इतना ही नहीं, विशेष रूप से बच्चों के मामले में खुले में शौच के बुरे प्रभाव, अवरुद्ध विकास, कम प्रतिरोधकता आदि के रूप में दीर्घ अवधि में दिखते हैं और ये परिणाम केवल उन लोगों तक सीमित नहीं होते हैं जो खुले में शौच करते हैं । इससे वे सभी लोग भी प्रभावित होते हैं जो उस इलाके में रहते हैं । इसके अलावा एक अन्य आयाम महिलाओं एवं लड़कियों की आत्मसम्मान की भावना से जुड़ा है। शौचालय होने से महिलाओं पर यौन हमलों का जोखिम, सर्प दंश, अँधेरे में दुर्घटनाओं व मल त्याग के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा करने आदि की समस्याएं भी काफी कम होती हैं । शौचालय न होने की स्थिति में बुजुर्गो, बीमार व्यक्तियों एवं शारीरिक अथवा मानसिक अक्षमताओं वाले व्यक्तियों की समस्या का क्या होता है? ग्राम पंचायत (या तो स्वयं या फिर जी पी डब्ल्यू एस सी/ वी डब्ल्यू एस सी के माध्यम से) को ऐसे परिवारों की संख्या की पहचान करनी चाहिए जहाँ शारीरिक अथवा मानसिक अक्षमताओं वाले व्यक्ति तथा बुजुर्ग या बीमार सदस्य रहते हैं परन्तु समुचित शौचालय की व्यवस्था नहीं है। संभव सीमा तक ऐसे परिवारों के लिए सरकारी योजनाओं के तहत सहायता प्राप्त करने के लिए ग्राम पंचायत की योजनाओं में प्राथमिकता दी जानी चाहिए । हमारे गाँव के परिवार गरीब हैं, शौचालयों के निर्माण में निवेश करना उनके लिए संभव नहीं है? संसाधन रहित एवं गरीब परिवारों के लिए भी शौचालयों में निवेश करने का आर्थिक महत्व है । यह छोटा निवेश स्वास्थ्य में सुधार, वयस्कों के लिए कार्य दिवसों की संख्या में वृद्धि, बच्चों की स्कूलों में उपस्थिति में वृद्धि, चिकित्सा पर वार्षिक खर्च में कमी के रूप में निवेश को वापस करता है तथा आत्मसम्मान की भावना भी पैदा करता है । शौचालयों में निवेश की उपलब्धि किसी अन्य पारिवारिक खर्च से काफी अधिक है । स्वास्थ्य के लिए हानिकर पदार्थो (अल्कोहल, तंबाकू आदि) के प्रयोग व अन्य सामाजिक कार्यो एवं गतिविधियों की तुलना में शौचालय के निर्माण में निवेश करना फायदेमंद है और इसके लिए साहस एवं इच्छा शक्ति की जरूरत होती है। एनबीए एवं मनरेगा के तहत आई एच एस एल के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करना अभी संभव है । ग्राम पंचायत स्तर के पदाधिकारियों को कम लागत वाले शौचालयों के निर्माण के लिए उपलब्ध विकल्पों के बारे में ऐसे परिवारों का मार्गदर्शन करना चाहिए । क्या यह सच है कि बच्चों का मल हानिकर नहीं होता है? यह सच नहीं है । बच्चों के मल में भी उतनी ही संख्या में बैक्टीरिया एवं वायरस होते हैं जितनी संख्या में किसी वयस्क के मल में होते हैं । इसलिए, या तो शौचालय में या फिर जमीन में गाड़कर सुरक्षित ढंग से बच्चों के मल का निस्तारण करना जरूरी है । इसके अलावा, मल त्याग के बाद बच्चों एवं शिशुओं के हाथों तथा शरीर के अंगों को साबुन से धोना चाहिए । खेत में खुले में शौच करने से मिट्टी को खाद मिलती है तो क्यों मुझे शौचालय का प्रयोग क्यों करना चाहिए? खेत में जो मल त्याग किया जाता है, वह पर्यावरण में फ़ैल जाता है और इससे इंसानों एवं जानवरों में बीमारियाँ फैलने की काफी संभावना पैदा हो जाती है क्योंकि यह अशोधित होता है तथा बैक्टीरिया एवं वायरस से भरा होता है । सुरक्षित ढंग से शोधित मल का ही खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है न कि कच्चे अशोधित मल का । ग्राम पंचायत में सफाई एवं स्वच्छता अभियानों में सामाजिक न्याय की प्रासंगिकता क्या है? ऐतिहासिक एवं आर्थिक कारणों से स्वच्छता अभियानों में कमजोर वर्गो, जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति द्वारा रहने वाले इलाके या कॉलोनियाँ आमतौर पर पर्याप्त रूप से शामिल नहीं होती हैं या स्वच्छता अभियानों में उन पर विशेष ध्यान नही दिया गया है । ग्राम पंचायत के प्रतिनिधि (सरपंच, वार्ड सदस्य तथा सरकारी पदाधिकारी) और जी.पी.डब्ल्यू.एस सी/ वी.डब्ल्यू.एस.सी सदस्य) ऐसे क्षेत्रों में शौचालयों के लिए अभियान चलाने के लिए अतिरिक्त प्रयास कर सकते हैं तथा खुले में शौच करने की प्रथा पर रोक लगाने में उनकी मदद कर सकते हैं । उन्हें अपने घरों में शौचालयों का निर्माण करने के लिए भी प्रेरित कर सकते है । सरकार या कोई बाहरी एजेंसी हमारे लिए शौचालयों का निर्माण क्यों नहीं करती है? अनुभव से पता चला है कि भारी मात्रा में पैसा खर्च किये जाने के बावजूद लोगों के योगदान एवं भागीदारी के बिना निर्मित शौचालय (उनका स्थान, प्रकार, सामग्री, लागत आदि जो भी हो) असफल हो गए हैं या उनका समुचित रूप से प्रयोग नहीं किया जाता है । इसलिए, अब लोगों में जागरूकता पैदा करने तथा अपने स्वयं के संसाधनों से शौचालयों का निर्माण करने के लिए उन्हें प्रेरित करने पर बल दिया जा रहा है । बाढ़ एवं सूखे के दौरान स्वच्छता बनाए रखना : बाढ़ के दौरान स्वच्छता बनाए रखना अधिक जरूरी है क्योंकि बाढ़ के दौरान बाढ़ के पानी से (ठोस तरल अपशिष्ट से तथा शवों से) पेय जल के स्त्रोतों के दूषित होने की प्रबल संभावना होती है | इसी तरह, सूखे के दौरान पानी की भारी किल्लत से पानी के अभाव में सफाई की बुनियादी आदतों का पालन न करने की वजह से भी स्वच्छता प्रभावित होती है| बाढ़ एवं सूखे के दौरान बरती जाने वाली कुछ सावधानियाँ इस प्रकार हैं: बाढ़ के लिए: साबुन से हाथ धोने की व्यवस्था के साथ चयनित स्थानों पर आपातकालीन उपाय के रूप में अस्थायी खंदक शौचालयों का निर्माण करना |पानी के सभी स्त्रोतों की उच्च स्तर की सुरक्षा, सेवा जलाशयों के आसपास के क्षेत्रों की सफाई तथा पानी को असंक्रमित करना | बाढ़ एवं सूखा दोनों के लिए:गाँव के लोगों की पानी की मांग की पूर्ति के लिए वैकल्पिक स्त्रोतों से सुरक्षित पेय जल प्राप्त करना | जहाँ जरूरी हो, इसके परिवहन की समुचित व्यवस्था करना और पेय जल भंडारण के लिए ढक्कन के साथ पर्याप्त संख्या में साफ़ कंटेनर प्रदान करना| सूखे के लिए: खंदक शौचालयों के आसपास तथा अस्थायी स्टैंड पोस्ट के आसपास हाथ धोने की समुचित व्यवस्था होनी आमतौर पर ऐसी स्थितियों के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग परामर्श जारी करते है जिसमें लोगों को संचारी रोगों के फैलने की संभावना के बारे में चेतावनी दी जाती है तथा इन रोगों को फैलने से रोकने के लिए सावधानी बरतने के लिए लोगों से निवेदन किया जाता है | इसलिए, ग्राम पंचायत को इन परामर्शों पर नजर रखनी चाहिए तथा गाँव के लोगों में सावधानी के संदेशों का पूरे जोश के साथ प्रसार करना चाहिए | स्वच्छ भारत – एक जन आंदोलन: खुले में शौच के खिलाफ समाज की पहल देखिए इस विडियो में स्रोत: पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार