परिचय सुपोषण स्वास्थ्य का मूल अंग-संगठन है। सामान्य वृद्धि और विकास के लिए तथा जीवन-स्तर का अनुरक्षण करने के लिए, इसका विशेष महत्त्व है। वर्तमान शताब्दी के प्रारम्भ में, विटामिनों की खोज के फलस्वरूप, पोषण विज्ञान का पुन: आविष्कार हुआ है। उस समय से पोषण के क्षेत्रा में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुर्इ है। दो विश्व महायुद्धों के बीच, इस दिशा के अनुसंधान-कार्य मुख्यत: विटामिनों पर ही केनिद्रत थे। द्वितीय विश्व महायुद्ध के पश्चात प्रोटीन सम्बन्धी अनुसंधानों की गति में विशेष वृद्धि हुर्इ। सत्तर के दशक में ऐथिरोकोठिन्य (ऐथिरोस्क्लोरोसिस) आदि रोगों को संप्रापित और इसकी जटिलताओं के विषय में तथा मुख्यत: विपथी âदयधमनी सम्बन्धी रोगों के बारे में, दैनिक आहार की भूमिका को सुनिशिचत करने में रुचि ली गर्इ है। पिछले दो दशकों से मानव स्वास्थ्य और रोगों की संप्रापित में श्वसन-अनुज्ञापक अवयवों (तत्त्वों) और आहारीय फोक ;पिइतमद्ध की भूमिका के अध्ययन ने भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है। परिभाषाएँ पोषण - यह आहार, इसके पोषक तत्त्वों, इसमें निहित अन्य पदार्थों इसकी क्रियाओं, प्रतिक्रिया और स्वास्थ्य तथा रोगों के साथ इसके संतुलन का विज्ञान है। आहार - कोर्इ भी ठोस या तरल पदार्थ, जिसका शरीर में अतग्र्रहण करके पाचन किया जाता है और शरीर में समिमलित किया जाता है तथा जो शरीर को स्वस्थ रखता है आहार कहलाता है। भोजन को मुख्यत: अनाज, दालें, सब्जियां , फल, दूध, अण्डा, मांस, वसा व शर्करा में विभाजित किया गया है। पोषक तत्त्व - पोषक तत्त्व आहार के वे सभी संघटक होते हैं, जिनका शरीर में उपयुक्त मात्रा में संभरण किया जाना चाहिए। ये प्रोटीन, वसा, खनिज लवण, कारबोज, पानी और विटामिन हैं। पोषण स्तर - पोषण स्तर को इस रूप में परिभाषित किया जाता है कि प्रचलित आहार प्रणाली शरीर की आवश्यकताओं को किस सीमा तक पूरा किया करती है। दूसरे शब्दों में, यह भोजन के बाद की शरीर की सिथति को सूचित करता है। किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य पोषक तत्त्वों के शरीर में समिमलित होने के कारण होता है। इसका आंकलन आहारीय परीक्षण, शारीरिक मापदण्ड व प्रयोगशाला में परीक्षण द्वारा किया जा सकता है। ऊर्जा की आवश्यकता ऊर्जा - कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं। यह शरीर में उत्पन्न उष्मा होती है, जिसका उपयोग देहताप के अनुरक्षण और शरीर के नये घटकों के संश्लेषण करने सम्बन्धी ऐचिछक एवं अनैचिछक क्रियाओं को सम्पन्न करने में किया जाता है। आधारी चयापचय दर- बिना किसी चेतन प्रयास के शरीर में कर्इ प्रकार की प्रक्रियाएं उस समय भी होती हैं, जबकि व्यक्ति पूर्ण विश्रानित में होता है और कोर्इ भी कार्य नहीं कर रहा होता है। इनमें ऐसी अनैचिछक प्रक्रियाएं भी हैं। जैसे दिल का धड़कना और रक्त संचरण। इन प्रक्रियाओं को ही चयापचय (उपापचय) प्रक्रिया कहते हैं। इन प्रक्रियाओं को करने में प्रयुक्त शकित को आधारी चयापचय दर कहते हैं जिसे संक्षिप्तीकृत रूप में आ.च.द. (बीएमआर) कहा जाता है। अधिकतम लोगों में आधारी शकित की आवश्यकता, कुल शकित की आवश्यकता के आधे भाग से ज्यादा होती है। ऊर्जा की इकार्इ - आहार का ऊर्जा मान किलो कैलोरी (कि. कैल.) के रूप में दर्शाया जाता है। एक किलोग्राम पानी का ताप एक डिग्री सेन्टीग्रेड बढ़ाने के लिए वांछित उष्मा की मात्राा को एक किलो कैलोरी माना जाता है। मीटर प्रणाली में, किलो कैलोरी के स्थान पर अन्तर्राष्ट्रीय इकार्इ किलोजूल का प्रयोग किया जाता है। एक किलो जूल, न्यूटन के शकित सिद्धान्त के प्रयोग द्वारा, एक किलोग्राम मात्रा के ठोस पदार्थ को एक मीटर दूर हटाने लायक विस्तारित ऊर्जा होती है। 1 कैलोरी = 4.148 जूल 1 किलो कैलोरी =4.184 किलो जूल 1000 किलो कैलोरी = 4.184 एम जूल 1 किलो जूल = 0.239 किलो कैलोरी 1 एम जूल = 239 कैलोरी कुल ऊर्जा आवश्यकता को प्रभावित करने वाले कारक आयु, लिंग, शरीर का आकार, जलवायु, अन्त:स्रावी ग्रंथियों (एण्डोक्राइम) ग्लैण्ड का स्राव, स्वास्थ्य स्तर, गर्भावस्था और दुग्धपान कराने की अवस्था में परिवर्तित शारीरिक सिथति, आहार का प्रभाव और शारीरिक क्रियाओं की मात्राा आदि घटक तत्त्व ऊर्जा आवश्यकता को प्रभावित करते हैं। 1. आयु - वृद्धिकाल चयापचय में आधारी दर बहुत ज्यादा होती है। इसलिए शैशव काल में प्रतिकिलो शरीर भार ऊर्जा आवश्यकताएँ, व्यस्कावस्था की ऊर्जा आवश्यकताओं की अपेक्षा अधिक होती है। इसी प्रकार प्रारमिभक वयस्कावस्था के बाद चयापचय आधारी दर में सतत गिरावट के कारण ऊर्जा आवश्यकताएँ भी उत्तरोत्तर कम होती जाती हैं। शैशव काल में चयापचय की दर अधिक होती है और अधिकतम 1 से 2 वर्ष के बच्चे की होती है। दो से पांच वर्ष के दौरान चयापचय की दर में गिरावट आती है और इसके पश्चात उसके वयस्क होने तक ये दर कम होती रहती है। 2. लिंग - किशोर लड़कियों और वयस्क सित्रायों की अपेक्षा किशोर लड़कों और वयस्क पुरुषों में आधारी चयापचय दर ऊंची होती है यह लिंग भेद से प्रत्यक्ष प्रभाव के कारण नहीं, बलिक शारीरिक बनावट की भिन्नता के कारण होती है। पुरुषों में ज्यादा मांसपेशियां और ग्रन्थीय ऊतक होते हैं, जो चयापचय में ज्यादा सक्रिय होते हैं और सित्रायों में वसामय ऊतक ज्यादा होते हैं, जो चयापचय में कम सक्रिय होते हैं। इसी कारण पुरुषों में सित्रायों की अपेक्षा, ऊर्जा की अधिक आवश्यकता होती है। 3. शरीर का आकार - ऊर्जा आवश्यकताओं पर शरीर के आकार का विशेष प्रभाव पड़ता है, क्योंकि बड़े शरीर में ज्यादा मांसपेशियां और ज्यादा ग्रन्थीय ऊतक होते हैं, जिनका अनुरक्षण करना पड़ता है, इसलिए ज्यादा ऊर्जा की आवश्यकता होती है। हमारे शरीर से त्वचा द्वारा लगातार ऊष्मा का निकास होता है। अत: शरीर का आकार जितना बड़ा होगा, ऊष्मा का निष्कासन उतना अधिक होगा। एक पतले, लम्बे, व्यक्ति का शरीर सतह एक छोटे, मोटे व्यक्ति की अपेक्षा अधिक होता है; अत: उसकी चयापचय दर अधिक होगी। 4. जलवायु - यह सर्वविदित है कि चयापचय आधार दर शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्राों की अपेक्षा उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में कम होती है। इसलिए यदि तापमान 14 डिग्री सेन्टीग्रेड से कम होता है, तो कार्य में ऊर्जा व्यय कुछ ज्यादा होने लगता है। फिर भी, यह अनुभव किया गया है कि भारत में तापमान के लिए किसी प्रकार के समायोजन की आवश्यकता नहीं है। 5. अन्त:स्त्रावी ग्रनिथयों का स्राव - ऊर्जा आवश्यकता पर विशेष रूप से अवटुग्रनिथ (थायोरोइड ग्लैण्ड) का अच्छा खासा प्रभाव पड़ता है। यदि यह अतिसक्रिय (अवटु अतिक्रियता) होती है तो आधारी चयापचय.दर बढ़ जाती है, और यदि इसकी क्रियाशीलता कम होती है (अवटु अल्पक्रियता), तो आधारी चयापचय-दर भी घट जाती है। इसी कारण ऊर्जा आवश्यकता भी बढ़ती-घटती रहती है। 6. स्वास्थ्य का स्तर - बुखार के कारण तथा इसी प्रकार कुपोषण के कारण व्यक्ति की आधारी चयापचय दर प्रभावित होती है। शरीर का तापमान बढ़ाने वाली अस्वस्थता के कारण ऊर्जा उत्पादन आधार काफी बढ़ जाता है और इसी कारण आधारी चयापचय दर भी बढ़ जाती है। साथ ही ऊर्जा आवश्यकता भी बढ़ जाती है। 7. शारीरिक सिथति में परिवर्तन - गर्भावस्था में तथा स्तनपान कराने की अवस्था में आधारी चयापचय दर में वृद्धि के कारण, ऊर्जा आवश्यकताएँ भी बढ़ जाती हैं। गर्भावस्था में भ्रूण और मातृ ऊत्तकों की वृद्धि के संभरण के कारण अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है। स्तनपान कराने की अवस्था में दूध के निर्माण के लिए अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है। 8. आहार का प्रभाव - भोजन के पचाने में, आत्मसात्करण में, ऊतकों तक पहुंचाने में तथा इसके उपयोग में कार्य की पर्याप्त मात्रा उत्सर्जित हो जाती है। भोजन के अतग्र्रहण के कारण वृद्धित ऊर्जा उत्पादन को भोजन की विशिष्ट गत्यात्मक क्रिया के रूप में जाना जाता है। अकेले प्रोटीन के अन्तग्र्रहण से चयापचय-दर (Metabolic Rate) 30 प्रति शत बढ़ जाती है। मिश्रित आहार के आधार पर, जो प्राय: अन्तर ग्रहण किया जाता है, भोजन की विशिष्ट गत्यात्मक क्रिया, ऊर्जा आवश्यकता का लगभग 10 प्रतिशत होती है। 9. शारीरिक क्रिया की मात्रा - किसी भी प्रकार की शारीरिक क्रिया से ऊर्जा खपत, ऊर्जा आवश्यकता के आधार बिन्दु से ज्यादा बढ़ जाती है। ऊर्जा खपत की मात्रा में, सभी प्रकार की शारीरिक क्रियाओं के लिए ऊर्जा का स्थान, आधारी चयापचय से दूसरा है। नींद के समय हमारी चयापचय दर 10: कम होती है। कुल मिलाकर चयापचय दर पर इसका प्रभाव नींद के घण्टों व नींद के प्रकार पर निर्भर करता है। ऊर्जा आवश्यकता का निर्धारण शारीरिक क्रिया की प्रकृति तथा समयावधि के आधार पर किया जाता है। कार्यालय, बही-खाता, टंकण, अध्यापन आदि अभ्रमणशील हल्के कार्यों में, उपचर्या, गृहसज्जा और बागवानी जैसे सक्रिय और मध्यम श्रम कार्यों की अपेक्षा कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। गडढे खोदने, सामान ढ़ोने जैसे भारी शारीरिक श्रम के कार्यों में लगे श्रमिकों के लिए ऊर्जा की और भी अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है। स्त्रोत: इंटरनेट, दैनिक समाचारपत्र नोट: भोजन में मैक्रोन्युट्रिएंट्स व् माइक्रोन्यूट्रीएंट्स के बारे में और विस्तृत जानकारी के लिए देखें सीनजर्स क्लब द्वारा वीडियो क्या है मनुष्य शरीर में पाचन क्रिया का काम? देखिये इस विडियो में