मिशन इंद्रधनुष स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सात रंगों का प्रदर्शन करने वाला ‘मिशन इंद्रधनुष’ शुरू किया है जिसके तहत ऐसे 89 लाख बच्चों को टीके लगाए जाने हैं जिन्हें किसी कारणवश पहले टीके नहीं लगे या जिन्हें पूरे टीके नहीं लगे। उन्हें जीवन के लिए खतरा होने वाले 7 रोगों के खिलाफ सुरक्षा देना है। इनमें डिप्थेरिया, खांसी,टिटनेस, पोलियो, टीबी, खसरा और हेपेटाइटिस- बी शामिल हैं। इसके अलावा चुने हुए जिलों एवं राज्यों में जापानी बुखार और टाइप-बी हेमोफाइलस इन्फ्ल्यूंजा के टीके भी लगाए जाएंगे। गर्भवती महिलाओं को भी टिटनेस का टीका लगाया जाएगा। 7 अप्रैल, 2015 को विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर पहले चरण के पहले दौर के टीकाकरण की शुरूआत की गई जिसके तहत 28 राज्यों के 201 जिलों को केंद्र में रखा गया। उसके बाद अप्रैल, मई, जून और जुलाई 2015 में एक सप्ताह का तीसरा दौर शुरू होगा। यह अभियान हर महीने की 7 तारीख को शुरू होगा। उपरोक्त 201 विशेष जिलों में लगभग 50 प्रतिशत उन बच्चों को टीके लगाए जाएंगे जिन्हें पहले टीके नहीं लगे हैं या पूरे टीके नहीं लगे हैं। इनमें से 82 जिले उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के हैं जहां ऐसे बच्चों की संख्या 25 प्रतिशत है। जिलों में मिशन के तहत चार लाख जोखिम वाले क्षेत्रों में ध्यान दिया जाएगा, जहां भौगोलिक, नस्ली या अन्य संचालन संबंधी चुनौतियां हैं। इनमें वे लोग शामिल हैं जो बंजारे हैं या सड़कों पर, निर्माण स्थलों पर, खान स्थलों पर, ईंट भट्टों पर मजदूरी करते हैं। इसके अलावा ऐसे लोगों को भी इसके दायरे में रखा गया है जो शहरी मलिन बसितयों में रहते हैं और ऐसे स्थानों पर रहते हैं जहां पर पहुंचना भौगोलिक रूप से कठिन है। वनों और जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाली आबादी को भी इसके दायरे में रखा गया है। देश के 352 जिलों में 7 अक्टूबर 2015 को दूसरा चरण शुरू किया गया। दूसरे चरण के दौरान चार विशेष टीकाकरण अभियान शुरू किया गया। यह अभियान 7 अक्टूबर से 7 दिनों के लिए चलाया गया। इसके अलावा ऐसा ही अभियान 7 नवंबर, 7 दिसंबर, 2015 तथा 7 जनवरी 2016, को भी दोहराया जाएगा। इसके तहत दो वर्ष से कम आयु के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को टिटनेस का टीका लगाया गया। मिशन इंद्रधनुष की उपलब्धियां उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मिशन इंद्रधनुष के पहले चरण के दौरान 9.4 लाख सत्रों का आयोजन हआ। इसके दौरान 1.89 करोड़ टीके बच्चों और गर्भवती महिलाओं को लगाए गए। टीकाकरण के इन दौरों के दौरान 75 लाख से अधिक बच्चों को टीके लगाए गए और लगभग 20 लाख बच्चों का पूर्ण टीकाकरण किया गया। इसके अलावा चारों दौर में 20 लाख से अधिक गर्भवती महिलाओं को टिटनेस के टीके लगाए गए। डायरिया की समस्या से निपटने के लिए जिंक टैबलट और ओआरएस पैकेट बच्चों में बांटे गए ताकि उन्हें डायरिया से बचाया जा सके। मिशन इंद्रधनुष के इन चार दौर के दौरान बच्चों को 16 लाख से अधिक ओआरएस पैकेट और लगभग 57 लाख जिंक टैबलट बांटी गईं। 26 नवंबर, 2015 को प्राप्त आंकड़ों के अनुसार मिशन इंद्रधनुष के दूसरे चरण के दौरान 4.49 लाख सत्र आयोजित हुए। इसके दौरान बच्चों और गर्भवती महिलाओं को 70 लाख टीके लगाए गए। टीकाकरण के इस दौर में 27 लाख से अधिक बच्चों को टीके लगाए गए और लगभग 8 लाख बच्चों का पूर्ण टीकाकरण किया गया। डायरिया की समस्या से निपटने के लिए जिंक टैबलट और ओआरएस पैकेट बच्चों में बांटे गए ताकि उन्हें डायरिया से बचाया जा सके। मिशन इंद्रधनुष के इन चार दौर के दौरान बच्चों को 5 लाख से अधिक ओआरएस पैकेट और लगभग 17 लाख जिंक टैबलट बांटी गईं। मातृत्व एवं प्रसवपूर्व टिटनेस उन्मूलन (एमएनटीई) विश्व लक्ष्य की तिथि दिसंबर 2015 के पूर्व भारत के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एमएनटीई का प्रमाणीकरण किया गया। भारत में चरणबद्ध तरीके से वर्ष 2003 में मातृत्व एवं प्रसवपूर्व टिटनेस उन्मूलन शुरू किया गया था। इस संदर्भ में आंध्र प्रदेश पहला राज्य है। नगालैंड देश का अंतिम राज्य है जहां 17 अप्रैल 2015 को प्रमाणीकरण किया गया। 2015 में मातृत्व एवं प्रसवपूर्व टिटनेस उन्मूलन प्राप्त करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहायक महानिदेशक डॉ. फलाविया बसत्रेओ ने भारत को बधाई दी। उल्लेखनीय है कि 1989 में पूरे विश्व में प्रसव पूर्व टिटनेस प्रतिवर्ष 7.87 लाख मृत्यु हुई थी जिसमें भारत में लगभग दो लाख मृत्यु हुई थीं। जननी सुरक्षा योजना और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के जरिए भी भारत में मातृत्व एवं प्रसवपूर्व टिटनेस उन्मूलन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। नए टीकों की शुरूआत का निर्णय टीकाकरण द्वारा रोगों से बच्चो के बचाव के लिए नए टीकों की शुरूआत करने का प्रस्ताव किया गया है। यह कदम भारत के सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत किया जा रहा है। इन टीकों की शुरूआत चरणबद्ध तरीके से की जाएगी। यह निर्णय भी किया गया है कि जापानी बुखार से निपटने के लिए वयस्क टीकाकरण शुरू किया जाए। नए टीके के प्रकार इनएक्टिी वेटेड पोलियो टीका (आईपीवी) भारत पोलियो मुक्त देश है लेकिन इस दर्जे को बनाए रखने के लिए 30 अक्टूबर 2015 को आईपीवी की शुरूआत की गई। शुरूआत में ये टीके बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, असम और पंजाब में लगाए जा रहे हैं। इससे प्रतिवर्ष 2.7 करोड़ बच्चों को लाभ होगा। वयस्क जापानी बुखार का टीका (जेई) असम, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के ऐसे 21 जिलों की पहचान की गई है जहां जापानी बुखार फैलता है। इन इलाकों में 15 से 65 वर्ष आयु के लागों का टीकाकरण किया जाएगा। इससे जापानी बुखार से मरने वाले वयस्कों की मृत्यु दर में कमी आएगी। रोटावायरस टीका दुनिया में रोटावायरस के कारण बच्चों और शिशुओं में भयानक पेचिश होती है। भारत में प्रतिवर्ष 2 लाख बच्चे डायरिया से मरते हैं जिनमें 1 लाख मौतें रोटावायरस से होती हैं। रोटावायरस टीका लगाने से हर साल लगभग 1 लाख जीवन बचाये जा सकते हैं। इस टीके की शुरूआत ओडिशा, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और आंध्र प्रदेश में 2016 की पहली तिमाही में की जाएगी। मीजेल्स रूबेला टीका मीजेल्स रूबेला टीका से देश में खसरा समाप्त होता है और रूबेला को नियंत्रित किया जाता है अब तक रूबेला संबंधी लगभग 25 हजार मामले हर साल सामने आते हैं और यदि बच्चा बच जाता है तो उसे विकलांगता जकड़ लेती है। इस टीकाकरण की शुरूआत उचित योजना बनाने के बाद शुरू की जाएगी और इसके दायरे में 45 करोड़ बच्चे होंगे। शिशु स्वास्थ्य विशेष नवजात ईकाइयां (एसएनसीयू) बीमार, समय से पूर्व एवं जन्म के समय कम वजन वाले नवजात बच्चों की देखभाल का मजबूत बनाने के लिए जिला अस्पतालों एवं तृतीयक देखभाल अस्पतालों में विशेष नवजात ईकाइयां (एसएनसीयू) स्थापित की गई है। यह 4 प्रशिक्षित चिकित्सकों एवं 10-12 परिचारिकाओं एवं सहयोगी कर्मचारियों के साथ 12-20 बिस्तरों वाली ईकाइ है, जिसमें बीमार नवजातों को 24 घंटे सेवाएं देने का प्रावधान है। वर्तमान में 602 एसएनसीयू संचालनगत बताई जाती हैं तथा 2014-15 में इनमें 7.50 लाख से अधिक नवजातों का उपचार किया गया। मातृ स्वास्थ्य "दक्ष" स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के कौशल में सुधार लाने के लिए गुणवत्ता वाली सेवाएं (प्रजनन, मातृ, नवजात, बाल एवं किशोर स्वास्थ्य) प्रदान करने के लिए अपनी भारत सरकार ने लिवरपूल ट्रॉपिकल मेडिसिन (एलएसटीएम) दिल्ली और एनसीआर में पांच राष्ट्रीय कौशल प्रयोगशाला “दक्ष” की स्थापना की है। जो निम्न स्थानों पर स्थित हैं- जामिया हमदर्द भारत की प्रशिक्षित नर्स एसोसिएशन (टीएनएआई) राष्ट्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संस्थान (एऩआईएचएफड्बल्यू) सफदरजंग अस्पताल लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज राष्ट्रीय कौशल प्रयोगशालाओं को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जोड़ा जा रहा है। 30 स्टैंड- अलोन कौशल प्रयोगशालाओं को गुजरात, हरियाणा , बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल,ओडिशा, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे अलग-अलग राज्यों में स्थापित किया गया है। राज्यों के साथ राष्ट्रीय कौशल प्रयोगशाला का लिंकेज इस प्रकार है : - लैब कौशल राज्य भारत की प्रशिक्षित नर्स एसोसिएशन उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक, केरल, चंडीगढ़, दादर और नगर हवेली, नगालैंड लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज असम, जेके, तमिलनाडु, पंजाब, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम एऩआईएचएफडीडल्यू ओडिशा, राजस्थान, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, गोवा, हिमाचल प्रदेश,सिक्किम, दमन एवं दीव, जामिया हमदर्द जामिया हमदर्द मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, अंडमान एवं निकोबार द्वीप, पुडुचेरी सफदरजंग अस्पताल बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र 2, गुजरात, लक्षद्वीप, मणिपुर, त्रिपुरा कौशल प्रयोगशाला के उद्देश्य इस प्रकार हैं : - मुख्य मानकीकृत तकनीकी कौशल और ज्ञान को आरएमएनसीएच सेवाओं के लिए सेवा प्रदाता द्वारा अधिग्रहण और मजबूती में मदद करना। स्वास्थ्य सुविधाओं में कुशल कर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है, सेवा पूर्व प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करना, सतत नर्सिंग शिक्षा और चिकित्सा शिक्षा उपलब्ध कराना। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री श्री जे पी नड्डा ने 9 मार्च 2015 को राष्ट्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संस्थान (एऩआईएचएफड्बल्यू) में राष्ट्रीय कौशल प्रयोगशाला 'दक्ष'का उद्घाटन किया था। आज की तारीख तक राष्ट्रीय कौशल प्रयोगशाला में 797 तक स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित किया गया है जिसमें नर्सिंग ट्यूटर्स, कौशल प्रयोगशाला प्रशिक्षक, प्रोफेसर , चिकित्सा अधिकारी,कौशल प्रयोगशाला ट्रेनर आदि शामिल हैं। भारत की नवीनतम पहल सरकार महिलाओं के जीवन को बचाने में एक बड़ी सफलता हो सकती है। परिवार नियोजन (1) विकल्प चयन का विस्तार - अब तीन नए विकल्पों को राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम में पेश किया जा रहा है। इंजेक्टे बल डीपीएमए पीओपी सैंटक्रो मान (2) गर्भनिरोधकों की बेहतर पैकेजिंग - गर्भनिरोधकों की वस्तुओं की मांग को प्रभावित करने के लिए कंडोम, ओसीपी और ईसीपी की पैकेजिंग अब सुधार किया जा रहा है। किशोर स्वास्थ्य राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरकेएसके) राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरकेएसके) यौन और प्रजनन स्वास्थ्य, पोषण, देश के 253 मिलियन किशोरों की मानसिक स्वास्थ्य और मादक द्रव्यों के दुरुपयोग संबंधी चिंताओं का निवारण, चोट और हिंसा (लिंग आधारित हिंसा सहित) का निवारण करने के व्यापक उद्देश्य के साथ जनवरी 2014 में शुरू किया गया था। जिसके लिए प्रभावी और सुसंगत कार्यक्रमों और योजनाओं का सहारा लिया गया। कार्यक्रम के प्रमुख घटक हैं समुदाय आधारित हस्तक्षेप, सुविधा आधारित हस्तक्षेप सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन संचार और अंतर- क्षेत्रीय अभिसरण। सामुदायिक आधारित हस्तक्षेप साथी शिक्षा कार्यक्रम सक्रिय और आत्मविश्वास से किशोरों के एक समुदाय का निर्माण करने के लिए जो उचित शिक्षित हो और अपने स्वास्थ्य और भलाई के लिए उचित निर्णय लेने में सक्षम हों ऐसे युवा आरकेएसके कार्यक्रम मुख्य वाहक हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने आरकेएसके के लिए परिचालन दिशानिर्देशो में चार साथियों शिक्षकों जिनमें दो पुरुष और दो महिलाएं हों उन्हें एक गांव या 1000 की जनसंख्या के अनुसार चयन करने का प्रस्ताव रखा है। इन समुदाय स्तर साथी शिक्षकों को संरचित उन्मुखीकरण सत्र के माध्यम से यौन और प्रजनन, स्वास्थ्य, पोषण, चोट और हिंसा, गैर संचारी रोगों, मानसिक स्वास्थ्य और मादक द्रव्यों के दुरुपयोग की रोकथाम पर मानकीकृत जानकारी और ज्ञान प्रदान किया जाएगा। पीई योजना के लागू करने के पहले चरण में 1800 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के तहत गांवों शामिल किया जाएगा। वर्ष के दौरान लगभग 2 लाख साथी प्रशिक्षकों को समुदाय आधारित प्रक्रिया के द्वारा चयन करके प्रशिक्षित किया जाएगा। साप्ताहिक आयरन फोलिक एसिड अनुपूरक कार्यक्रम इस कार्यक्रम में स्कूलों के लड़कों और स्कूल न आने वाली लड़कियों को आयरन और फोलिक एसिड की कमी से एनीमिया की रोकथाम के लिए साप्ताहिक रूप से आइएफए गोलियां और हैलमिंथिक नियंत्रण के लिए एलबेन्डाजोल गोलियां देने का प्रावधान है। यह कार्यक्रम देश के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है जिसमें सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त, नगर निगम स्कूल और आगंन केंद्र शामिल हैं। यह कार्यक्रम तीन प्रमुख हितधारक मंत्रालयों - महिला और बाल विकास मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के द्वारा संयुक्त कार्यक्रम की योजना बना, क्षमता निर्माण और संचार गतिविधियों के माध्यम से लागू किया गया है। कार्यक्रम का उद्देश्य 8.4 करोड़ स्कूली और 2.8 करोड़ गैर स्कूली लाभार्थियों सहित कुल 11.2 करोड़ लाभार्थियों को कवर करना है। ग्रामीण भारत में किशोरियों के बीच मासिक धर्म स्वच्छता के संवर्धन के लिए योजना स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने किशोरियों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए आरसीएच-II में किशोर प्रजनन यौन स्वास्थ्य (एआरएसएच) के हिस्से के रूप में ग्रामीण क्षेत्रों में 10-19 वर्ष की आयु समूह की किशोरियों में मासिक धर्म स्वच्छता के संवर्धन के लिए योजना शुरू की है किशोर लड़कियों के लिए स्वास्थ्य। योजना के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं - - मासिक धर्म स्वच्छता पर किशोरियों के बीच जागरूकता बढ़ाना। सुविधा आधारित हस्तक्षेप - (1) मौजूदा किशोर अनुकूल स्वास्थ्य क्लीनिकों (एएफएचसी) सुदृढ़ीक रण (2) नए एएफएचसी की स्थापना (3) एएफएचसी पर प्रशिक्षित मानव संसाधनों - चिकित्सा अधिकारी, एएनएम और सलाहकारों की उपलब्धता सुनिश्चित करना। किशोर अनुकूल स्वास्थ्य क्लीनिक किशोरों के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के पहले संपर्क स्तर के रूप में काम करते हैं। ये क्लीनिक किशोर लड़कियों और लड़कों की विविध स्वास्थ्य एवं परामर्श की जरूरत को पूरा करने के लिए सभी स्तर के पार विकसित किया जा रहे हैं। इन व्यापक उद्देश्यों को प्राथमिकता वाले जिलों के जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केन्द्रों पर बेहतर कार्यात्मक संस्थापन माध्यम से हासिल किया जाएगा। एएफएचसी में तैनात चिकित्सा अधिकारी, एएनएम और सलाहकारों का प्रशिक्षण क्षमता निर्माण के लिए संरचित प्रशिक्षण योजना के विकास के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा रहा है। - ग्रामीण क्षेत्रों में किशोरियों के लिए उच्च गुणवत्ता युक्त सैनिटरी नैपकिन के लिए उपयोग को बढ़ावा देना। - सैनिटरी नैपकिन का पर्यावरण अनुकूल तरीके से सुरक्षित निपटान सुनिश्चित करना। इस योजना के तहत 6 सैनिटरी नैपकिन का एक पैकेट एनआरएचएम के ब्रांड 'फ्रीडे' के तहत प्रदान किया जाता है। ये नैपकिन आशा द्वारा लड़कियों को 6 रु. में 6 नैपकिन के एक पैकेट मूल्य पर बेचे जा रहे हैं। योजना का प्रारंभिक मॉडल 17 राज्यों में 112 चयनित जिलों में शुरू किया गया था। जिसमें सैनिटरी नैपकिन के पैकेटों की केंद्रीय आपूर्ति होती है। राज्यों को यह सलाह दी गई है कि वे प्रतिस्पर्धात्मक बोली के माध्यम से सैनिटरी नैपकिन पैक का मूल्य निर्धारित करें। वर्ष 2015-16 के दौरान 20 राज्यों में 162 जिलों में सैनिटरी नैपकिन पैक के राज्य स्तरीय खरीद के लिए मंजूरी दी गई है। सुविधा आधारित हस्तक्षेप - (1) मौजूदा किशोर अनुकूल स्वास्थ्य क्लीनिकों (एएफएचसी) सुदृढ़ीकरण (2) नए एएफएचसी की स्थापना (3) एएफएचसी पर प्रशिक्षित मानव संसाधनों - चिकित्सा अधिकारी, एएनएम और सलाहकारों की उपलब्धता सुनिश्चित करना। किशोर अनुकूल स्वास्थ्य क्लीनिक किशोरों के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के पहले संपर्क स्तर के रूप में काम करते हैं। ये क्लीनिक किशोर लड़कियों और लड़कों की विविध स्वास्थ्य एवं परामर्श की जरूरत को पूरा करने के लिए सभी स्तर के पार विकसित किया जा रहे हैं। इन व्यापक उद्देश्यों को प्राथमिकता वाले जिलों के जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केन्द्रों पर बेहतर कार्यात्मक संस्थापन माध्यम से हासिल किया जाएगा। एएफएचसी में तैनात चिकित्सा अधिकारी, एएनएम और सलाहकारों का प्रशिक्षण क्षमता निर्माण के लिए संरचित प्रशिक्षण योजना के विकास के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा रहा है। कन्वर्जेन्स आरकेएसके के तहत किशोरों के स्वास्थ्य के लिए कन्वर्जेन्स संरचनाओं को किशोर स्वास्थ्य एवं जिला समिति के लिए राज्य समिति के गठन के साथ संस्थागत किया गया है। इस समिति की अंतर विभागीय और अंतर-विभागीय प्रतिनिधित्व दोनों की नियमित बैठकें आयोजित की जाएंगी। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के तहत – परिवार नियोजन, मातृत्व स्वास्थ्य, राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम, एनएसीपी , राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम, राष्ट्री य मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, गैर संचारी रोग और आईईसी। अन्य विभागों/ योजनाओं के साथ – ड्ब्ल्यू सीडी, (आईसीडीएस बीएसवाई, सबला) एचआरडी, एईपी,एमजीएम, और युवा मामले और खेल (किशोर सशक्तिकरण योजना, राष्ट्री य सेवा योजना, एनवाईकेए स, एनपीवाईए ) अंतर निजी संचारण पर ध्यान देते हुए सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन संचार - वाईएफएस, मासिक धर्म स्वच्छता कार्यक्रम और किशोर गर्भावस्था से संबंधित मुद्दों को राज्यों के साथ विकसित और साझा किया गया है। व्यापक प्रसार विचार-विमर्श के बाद, यूनिसेफ के कार्यालय के सहयोग से एच प्रभाग द्वारा व्यापक संचारण रणनीति विकसित की गयी है। जो आरकेएसके के अधीन 6 पहचान प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के बारे में संचार अभियान के निरूपण पर राज्य और जिला कार्यक्रम प्रबंधकों को समग्र मार्गदर्शन प्रदान करता है। किशोर स्वास्थ्य के लिए संचार की समझ को मजबूत करने के लिए नवम्बर- दिसम्बर 2015 में आयोजित आरकेएसके क्षेत्रीय समीक्षा के दौरान इस रणनीति को राज्य और जिला स्तर के प्रबंधंको के साथ साझा किया गया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) में दो उप-मिशन शामिल हैं - राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) और राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (एनयूएचएम)। मुख्य कार्यक्रम घटकों में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत बनाना, प्रजनन- मातृत्व- नवजात शिशु और किशोर स्वास्थ्य (आरएमएनसीएच + ए) और संचारी और गैर-संचारी बिमारियां शामिल हैं। एनएचएम में न्यायसंगत, सस्ती और गुणवत्ता स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के लिए सार्वभौमिक पहुँच की उपलब्धी शामिल है जो लोगों की जरूरतों प्रति जवाबदेह और उत्तरदायी हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) एनआरएचएम ग्रामीण आबादी, विशेष रूप से कमजोर वर्ग के लिए सुलभ, सस्ती और गुणवत्ता युक्त स्वास्थ्य देखभाल उपलब्ध करता है। एनआरएचएम के तहत राज्यों के साथ साथ पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू- कश्मीर और हिमाचल प्रदेश पर विशेष ध्यान दिया गया है। मिशन में पानी, सफाई, शिक्षा, पोषण के रूप में स्वास्थ्य के निर्धारकों की एक विस्तृत श्रृंखला पर एक साथ कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए सभी स्तरों पर अंतर- क्षेत्रीय कंवर्जेंस के साथ एक पूर्णरूपेण क्रियात्मक, सामुदायिक स्वामित्व,विकेन्द् रीकृत स्वास्थ्य वितरण प्रणाली की स्थापना करने पर जोर दिया गया है। यह एनयूएचएम सभी राज्यों की राजधानियों, जिला मुख्यालयों 50 हजार या उससे अधीक जनसंख्या वाले शहरों, कस्बों में लागू है। एनएचएम के अधीन प्रगति मानव संसाधनों के संवर्धन एनआरएचएम ने 10,027 मेडिकल अफसरों, 4023 विशेषज्ञों, 78,168 एएनएम, 53,456 स्टाफ नर्सों,35,514 आयुष डॉक्टरों आदि को अनुबंध आधार पर भर्ती करके लगभग लगभग 2.3 लाख अतिरिक्त स्वास्थ्य मानव संसाधनों को मंजूरी देकर मानव संसाधनों के अंतराल को भरने का प्रयास किया है। इसके अलावा स्वास्थ्य मानव संसाधनों में उपलब्ध कराने के अलावा एनआरएचएम ने आपातकालीन प्रसूति देखभाल, जीवन रक्षा अनेस्थेसिया कौशल, लेप्रोस् कोपिक सर्जरी में एमबीबीएस डॉक्टरों को प्रशिक्षित करके राज्यों को रणनीतिक रूप से अवस्थित सेवाओं की पहचान करके बहु- कौशल वाले डॉक्टरों पर ध्यान केंद्रित किया है। मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) एनएचआरएम के कार्यान्वयन के ढांचे के अधीन एक महिला समुदाय स्वास्थ्य कार्य कर्ता जिसे आशा के रूप में जाना जाता है। उनकी नियुक्ति प्रत्येक गांव में 1000 जनसंख्या पर एक आशा या जनजातीय क्षेत्र में एक बस्ती पर एक आशा के आधार पर की जाती है। जून, 2015 तक पूरे देश में 9.15 लाख आशा और लिंक कार्यकर्ताओं का चयन किया गया था। इन्फ्रासट्रक्चर को मजबूत बनाना/ उन्नयन करना एनआरएचएम के उद्देश्य सभी स्तरों पर सार्वजनिक स्वास्थ्य डिलिवरी प्रणाली को मजबूत बनाना है। पिछले 10 वर्षों के दौरान (जून 2015 तक) एससी, पीएचसी, सीएचसी, एसडीएच और डीएच सहित विभिन्न स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए 30,750 नए निर्माण और 32,847 नवीकरण/ उन्नयन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई। 24x 7 सेवाएं और प्रथम रेफरल सुविधाएं प्रथम रेफरल यूनिट के रूप में कार्य करने के 2,706 रेफरल अस्पतालों मजबूत बनाया गया। 24x7 सेवाएं प्रदान करने के लिए 13,667 पीएचसी/ सीएचसी, 14,441 नवजात देखभाल केंद्र, (एनबीसीसी ), 575 विशेष नवजात देखभाल इकाइयों और 2,020 नवजात स्थिरीकरण इकाइयों एनएचएम के तहत स्थापित की गई। मोबाइल चिकित्सा इकाइयां सबसे दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों तक सेवाएं प्रदान करने के लिए राज्यों में मोबाइल मेडिकल यूनिट मदद कर रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के 10 वर्षों में, 672 जिलों में से 333 को एमएमयू से सुसज्जित किया गया है। अभी तक देश में 1,107 एमएमयू कार्यरत हैं। राष्ट्रीय एम्बुलेंस सेवा 31 राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों में एम्बुलेंस बुलाने के लिए 108 या 102 टेलीफोन नंबर डायल करके लोगों को एंबुलेंस मंगाने की सुविधा प्राप्त है। 108 डायल करना एक आकस्मिक प्रतिक्रिया प्रणाली है। जिसे गंभीर देखभाल वाले मरीजों, ट्रामा या दुर्घटना के शिकार लोगों को अटेंड करने के लिए तैयार किया गया है। डायल 102 सेवाओं में मुख्य रूप से गर्भवती महिलाओं और अन्य बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से मरीजों को परिवहन सुविधा उपलब्ध कराना है। हालांकि अन्य श्रेणियां भी इसका लाभ उठा सकती हैं। आयुष को मुख्यधारा में लाना 10042 पीएससी, 2732 सीएचसी, 501 डीएच और 5714 स्वास्थ्य सेवाओं को आयुष की सुविधाओं में आवंटित करके आयुष को मुख्य धारा में लाया गया है। समुदाय भागीदारी पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। एनएचएम का एक मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय को बढ़ाना है। इसके उपयोग में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है। एनआरएचएम के अभी तक राज्यों/यूटी को 1,34,137.31 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। नवजात शिशु मृत्युदर में जो 1990 में 80 थी, वह 2013 में घटकर 40 हो गई है। कुल जननदर (टीएफआर) जो 1990 में 3.8 थी वह 2013 में घटकर 2.3 हो गई। भारत को ड्ब्ल्यूएचओ ने मार्च, 2014 में पोलियो मुक्त देश के रूप में प्रमाणित किया है जो भारत के लिए एतिहासिक उपलब्धी है। मातृ और शिशु ट्रेकिंग प्रणाली यह एक नाम आधारित ट्रेकिंग प्रणाली है जो भारत सरकार द्वारा स्वास्थ्य देखभाल सेवा उपल्बध करने वाली प्रणाली में सुधार लाने और निगरानी कार्यप्रणाली को मजबूत बनाने में सूचना प्रौद्योगिकी के नवाचार अनुप्रयोग के रूप में शुरू की गई है। इस योजना के तहत 2015-16 के दौरान कुल 1,18,68,505 गर्भवती महिलाओं को पंजीकृत किया गया। इसीप्रकार अक्टूबर, 2015 तक इस योजना के पांच वर्ष के कम आयु के 82,38,820 बच्चों को पंजीकृत किया गया। एमसीटीएफसी राष्ट्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संस्थान द्वारा परिचालित की गई है और 80 हेल्पडेस्क द्वारा परिचालित है। राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन को मंत्रिमंडल ने 1 मई, 2013 को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के एक उप मिशन के रूप में मंजूरी दी है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (यू पीएचसी) 1426 नए यू पीएचसी को मंजूरी दी गई 99 प्रथम रेफरल इकाइयों को मजबूत बनाने के लिए सहायता प्रदान की गई। 35 नए शहरी समुदाय स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना 2353 पूर्णकालिक चिकित्सा अधिकारियों, 2973 अंशकालिक चिकित्सा अधिकारियों,17584 एएनएम, 7209 कर्मचारी परिचारिकाओं, 2973 फार्मेसिस्ट एवं 3231 लैब टेक्निशियनों को मंजूरी दी गई। स्लम बस्ती के लिए 92,173 महिला आरोग्य समितियां (एमएएस) एवं 56,002 आशा को मंजूरी दी गई (एक एमएस 50 से 100 परिवारों को कवर करता है, जबकि आशा 200 से 500 परिवारों को कवर करता है)। एनएचएम के तहत प्रमुख पहल स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन संरचना को प्रारंभ करना 31,000 से अधिक सार्वजनिक सुविधाओं में स्वास्थ्य की गुणवत्ता को बेहतर बनाने तथा राज्यों को एक स्पष्ट रूपरेखा मुहैया कराने के लिए नवंबर, 2014 में राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन संरचना के तहत जिला अस्पतालों के लिए गुणवत्ता मानदंड (डीएच) , सीचीसी एवं पीएचसी प्रारंभ किए गए। कायाकल्प की शुरूआत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए एक पहल : कायाकल्प पहल को सार्वजनिक सुविधाओं में स्वच्छता, सफाई एवं संक्रमण नियंत्रण प्रचलनों को बढ़ावा देने के लिए प्रारंभ किया गया है। इस पहल के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का मूल्यांकन किया जाएगा और ऐसी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं जो स्वच्छता, सफाई एवं संक्रमण नियंत्रण के नवाचारों के असाधारण प्रदर्शन वाले मानदंडों को प्राप्त करेंगी उन्हें पुरस्कार और सराहना प्रदान की जाएंगी। इसके अतिरिक्त सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में स्वच्छ ता, सफाई एवं संक्रमण नियंत्रण प्रचलनों को बढ़ावा देने के लिए स्वच्छता दिशा-निर्देश 15 मई,2015 को जारी किया गया है। ये दिशानिर्देश सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में स्वच्छता को लेकर योजना निर्माण, बारंबारता, पद्धतियो , निगरानी आदि पर विस्तार से जानकारी मुहैया कराते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस)- 4 एनएफएचएस-4 को 2014 के मध्य में नीति एवं कार्यक्रम के लिए साक्ष्य मुहैया कराने और प्रमुख मानदंडों पर प्रगति की निगरानी के लिए उभरते महत्वपूर्ण स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तत्वों पर अनिवार्य डाटा एवं जानकारी मुहैया कराने के लिए प्रारंभ किया गया था। एनएफएचएस -4 का क्षेत्र कार्य प्रगति पर है। सर्वे के परिणामों के 2016 में आने की उम्मीद है और यह राष्ट्रीय राज्य एवं जिला स्तर आंकड़े मुहैया कराएगा। राष्ट्रीय नवजात कार्य योजना को प्रारंभ करना (आईएनएपी) वर्तमान में सालाना लगभग 7.47 लाख नवजातों की मृत्यु हो जाने का अनुमान है। सितंबर, 2014 में देश में रोकथाम की जाने वाली नवजात मौतों और मृतजन्मों में कमी लाने की गति को बढ़ाने के लिए आईएनएपी की शुरूआत की गई। इसका लक्ष्य ‘2030 तक एकल संख्या नवजात मृत्यु दर (एनएमआर)’ और ‘2030 तक एकल अंक मृतजन्म दर (एसबीआर)’ को अर्जित करना है। इस लक्ष्य के अर्जित हो जाने के बाद नवजात मौतों के 2030 तक सालाना 2.28 लाख से कम हो जाने की उम्मीद है। मिशन इंद्र धनुष की शुरूआत मिशन इंद्र धनुष की शुरूआत दिसंबर, 2014 में की गई जिससे कि 2020 तक 90 लाख बगैर प्रतिरक्षित/आंशिक रूप से प्रतिरक्षित बच्चों तक पहुंचा जा सके। पहले चरण में इसे 201 जिलों में क्रियान्वित किया गया है, दूसरे चरण में 297 अतिरिक्त जिलों को इसमें शामिल किया जाएगा। मिशन इंद्र धनुष के पहले चरण के दौरान लगभग 20 लाख बच्चों को पूर्ण प्रतिरक्षण प्राप्त हुआ। चार नए टीकों को मंजूरी चार नए टीकों जिनके नाम हैं रोटावायरस, इन एक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन (आईपीवी), मीजल्स – रूबेला वैक्सीन, जापानी इंसेफ्लाइटिस वैक्सीन को वयस्कों तक विस्तारित कर दिया गया है। इससे टीकों से बचाव होने वाली रूग्णता, विकलांगता एवं मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आएगी। मुफ्त दवा सेवा पहल एनएचएम के तहत 5 प्रतिशत तक अतिरिक्त वित्तपोषण (यह राज्यों को किए जाने वाले सामान्य आवंटन के अतिरिक्त है) उन राज्यों को प्रदान किया जाता है, जो मुफ्त दवा योजना लागू करते हैं। एमएचएन मुफ्त दवा सेवा पहल के तहत मुफ्त दवाओं के प्रावधान के लिए उल्लेखनीय वित्तपोषण उपलब्ध है जो कुछ विशिष्ट शर्तों की पूर्ति के विषय होंगे। मुफ्त नैदानिक सेवा पहल एनएचएम- मुफ्त नैदानिक सेवा पहल की शुरूआत 2013 में सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मुफ्त अनिवार्य नैदानिक सेवाएं प्रदान करने के लिए की गई थी जिसके तहत राज्यों का उनके साधनों के अनुरूप उल्लेखनीय वित्तपोषण मुहैया उपलब्ध कराया गया था। जैव चिकित्सा उपकरण रख-रखाव राज्यों को सभी सुचारू चिकित्सा उपकरण/मशीनरी के लिए व्यापक उपकरण रखरखाव के लिए योजनाएं बनाने को कहा गया है। मंत्रालय ने दिशा निर्देश के लिए मॉडल अनुबंध दस्तावेज वितरित किए हैं। व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल दिसंबर, 2014 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल शुरू करने पर एक रिपोर्ट मुहैया कराने के लिए एक कार्य बल का गठन किया। प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को व्यापक एवं सार्वभौमिक बनाने के लिए 9 कार्य क्षेत्रों का प्रस्ताव रखा गया है। इनमें शामिल हैं : प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की संस्थागत संरचनाओं एवं संगठनों को मजबूत बनाना व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए प्रौद्योगिकि यों, दवाओं एवं नैदानिकों की सुविधा को बेहतर बनाना रोगियों एवं सेवा प्रदाताओं को अधिकार संपन्न बनाने के लिए सूचना, संचार एवं प्रौद्योगिकी (आईसीटी) के उपयोग को बढ़ाना देखभाल की निरंतरता को बढ़ावा देना देखभाल की गुणवत्ता को बढ़ावा देना स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों पर ध्यान केंद्रित करना सामुदायिक भागीदारी पर जोर देना एवं स्वास्थ्य में समानता चिंताओं पर ध्यान देना प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को सहायता देने के लिए एक मानव संसाधन विकसित करना वित्तपोषण, साझेदारियों एवं जिम्मेदारियों समेत प्रसारण को मजबूत बनाना राज्यों को एक मध्य स्तरीय सेवा प्रदाता के नेतृत्व में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल टीम के साथ स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों के रूप में मौजूदा उपकेंद्रों को मजबूत बनाने के लिए एनएचएम के पीआईपी के जरिए सहायता पेशकश की जाती है। किलकारी एवं मोबाईल अकादमी गर्भवती महिलाओं, बच्चों के माता-पिता और क्षेत्र कार्यकर्ताओं के बीच नवजात देखभाल (एएनसी), संस्थागत प्रसव, नवजात पश्चात देखभाल (पीएनसी) एवं प्रतिरोधन के महत्व के बारे में उचित जागरूकता सृजित करने के लिए चरणबद्ध तरीके से देशभर में किलकारी एवं मोबाईल अकादमी सेवाएं क्रियान्वित करने का फैसला किया गया है। पहले चरण में 6 राज्यों उत्तराखंड, झारखंड, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्था न (एचपीडी) और मध्य प्रदेश में किलकारी प्रारंभ की जाएगी। 4 राज्यों- उत्तराखंड, झारखंड, राजस्था न एवं मध्य प्रदेश में मोबाईल अकादमी की शुरूआत की जाएगी। किलकारी एक इंटरएक्टिव वॉइस रिस्पोन्स (आईवीआर) आधारित मोबाईल सेवा है, जो सीधे गर्भवती महिलाओं, बच्चों की माताओं एवं उनके परिवारों के मोबाईल फोन पर गर्भावस्था एवं शिशु स्वास्थ्य के बारे में टाईम- सेन्सिटीव ऑडियो मैसेज (वॉइस कॉल) भेजती है। मोबाइल अकादमी पारस्परिक संचार, कौशलों पर एक किसी भी वक्त, किसी भी जगह ऑडियो प्रशिक्षण पाठ्यक्रम हैं, जिस तक कोई आशा अपने मोबाइल फोन से पहुंच सुलभ कर सकती है। राष्ट्रव्यापी तपेदिकरोधी प्रतिरक्षण सर्वे की शुरूआत 13 तपेदिक दवाओं के लिए प्रतिरोधी सर्वे की शुरूआत की गई जिससे कि समुदाय में बहु-दवा प्रतिरक्षण तपेदिक के बोझ का बेहतर आकलन मुहैया कराया जा सके। 5214 रोगियों के सैंपल आकार के साथ यह अब तक दुनिया का सबसे बड़ा सर्वे है जिसके परिणाम 2016 तक आ सकते हैं। कालाजार उन्मूलन योजना 2015 के आखिर तक प्रखंड पीएचसी स्तर तक प्रति 10,000 आबादी पर कालाजार की वार्षिक व्यापकता को एक से कम पर लाने के लिए कालाजार उन्मूलन योजना की शुरूआत की गई थी जिनमें शामिल है, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड के लिए नए प्राथिमकता वाले क्षेत्र प्रारंभ किए गए। सक्रिय खोज नई दवा से परहेज, समन्वित आंतरिक अपशिष्ट फुहार (आईआरएस) आदि को शामिल करने के लिए नई कार्य योजना। नई गैर-आक्रामक नैदानिक किट शुरू की गई। एनएचएम के तहत राज्यों को प्रोत्साहन देने के लिए मानदंड संशोधित किए गए। उपचर्या क्षेत्र एएनएम एवं जीएमएम के लिए स्कूल भारत सरकार ने केंद्र प्रायोजित योजना उपचर्या सेवाओं के मजबूतीकरण एवं उन्नयन के तहत 29 राज्यों में 278 चिन्हित जिलों में, जहां पहले से कोई भी ऐसा स्कूल नहीं है, केंद्रीय 132 सहायक परिचारिका प्रसूति विद्या (एएनएम) एवं 137 सामान्य सुश्रुषा एवं प्रसूति विद्या (जीएनएम) स्कूलों को खोलने का कदम उठाया है। सरकार ने 128 एएनएम स्कूलों एवं 137 स्कूलों की स्थापना के लिए मंजूरी दी है। इसके लिए 725.00 करोड़ रुपए तक के फंड पहले ही जारी कर दिए गए हैं। इस योजना के उद्देश्य हैं: - परिचारिकाओं की कमी को दूर करना भारत सरकार ने केंद्र प्रायोजित योजना उपचर्या सेवाओं के मजबूतीकरण एवं उन्नयन के तहत देश में 23 उच्च फोकस राज्यों के जिलों में, जहां पहले से कोई भी ऐसा स्कूल नहीं है, 132 सहायक परिचारिका प्रसूति विद्या (एएनएम) एवं 137 सामान्य सुश्रुषा एवं प्रसूति विद्या (जीएनएम) स्कूलों को खोलने का कदम उठाया है। इससे प्रति वर्ष उम्मीदवारों की 13,500 अतिरिक्त इनटेक क्षमता में वृद्धि होगी। नई पहल भारतीय परिचारिका चालू रजिस्टर भारत में परिचर्या के क्षेत्र में वर्तमान मानव संसाधनों के नवीनतम,सटीक एवं वास्तविक समय जनगणना प्राप्त करने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने आईएनसी के सहयोग से एक लाइव रजिस्टर नामक टैक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म विकसित करने की पहल की है। लाइव रजिस्टर में वर्तमान में काम करने वाली परिचारिकाओं के बारे में नवीनतम जानकारी शामिल होगी, जो भारत सरकार को देश में परिचारिका सेवा के लिए बेहतर श्रम बल की योजना बनाने एवं नीतिगत स्तर के फैसले करने में मदद करे। परिचारिका योजना निगरानी प्रणाली भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने परिचारिका योजना निगरानी प्रणाली नामक एक सॉफ्टवेयर मॉड्यूल का विकास किया है, जिससे कि योजना के क्रियान्वयन की कारगर तरीके से निगरानी की जा सके एवं प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके। राष्ट्रीय परिचर्या एवं प्रसूति विद्या पोर्टल राष्ट्रीय परिचर्या एवं प्रसूति विद्या पोर्टल राज्य परिचारिका परिषदों एवं समस्त परिचर्या एवं प्रसूति विद्या संवर्ग के लिए एक ऑनलाइन रिसॉर्स सेंटर है। राष्ट्रीय नेत्रहीनता नियंत्रण कार्यक्रम भारत 1976 में एक शतप्रतिशत केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में राष्ट्रीय नेत्रहीनता नियंत्रण कार्यक्रम के शुरूआत करने वाला पहला देश था। इस कार्यक्रम का लक्ष्य मुख्य रूप से केटेरैक्ट एवं ट्रैकोमा के कारण बचाव योग्य नेत्रहीनता के भारी बोझ को वर्तमान 1.49 के स्तर से कम करके 2020 तक 0.3 प्रतिशत तक लाना था। भारत में लाखों लोग इस रोकथाम योग्य नेत्रहीनता के शिकार थे। इसलिए ऑप्थेलमिक आईकेयर प्रदाताओं को एक छत के नीचे लाने तथा उन्हें तकनीकी ज्ञान प्रदान करने, आवश्यक उपकरण की आपूर्ति करने, लॉजिस्ट िक विकसित करने, कर्मचारि यों को आवश्यक ज्ञान के लिए प्रशिक्षित करने तथा नेत्र देखभाल सेवाओं को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने के लिए एक रणनीति विकसित की गई। 1974, 1986-89, 2001-02 एवं 2006-07 के दौरान रोकथाम योग्य एवं गैर- रोकथाम योग्य नेत्रहीनता के बड़े कारणों की जानकारी प्राप्त करने के लिए चार बड़े सर्वे किए गए। केटेरैक्ट एवं रिफ्रेक्टिव त्रुटियों को रोकथाम योग्य नेत्रहीनता के बड़े कारण माने गए। एनपीसीबी के तहत विश्व बैंक परियोजना भारत में नेत्रहीनता की गंभीरता को देखते हुए नेत्र देखभाल बुनियादी ढांचे, आप्थेलमक उपकरणों की आपूर्ति, श्रमबल प्रशिक्षण आदि के विकास क लिए 1994-02 वर्षों के दौरान विश्व बैंक से फंड जुटाए गए। इसके परिणामस्वरूप, देश में नेत्रहीनता की व्याप्ति 1986-89 के 1.40 प्रतिशत से गिरकर 2001-02 के दौरान 1.1 प्रतिशत पर आ गई। 10वीं पंचवर्षीय योजना अवधि (2002-2007) के दौरान विकेंद्रित दृष्टिकोण यह कार्यक्रम डब्ल्यूटीओ समेत कई एजेंसियों से प्राप्त तकनीकी ज्ञान एवं घरेलू बजट के प्रावधान के साथ उसी उत्साह के साथ जारी रहा। राज्य नेत्रहीनता नियंत्रण सोसाइटीज का निर्माण किया गया जिसके पर्यवेक्षण के तहत जिला नेत्रहीनता नियंत्रण सोसाइटीज ने देश के सभी जिलों में नेत्र देखभाल सेवाएं देने का काम करना शुरू कर दिया। इसका लक्ष्य बहु क्षेत्रवार एवं समन्वित प्रयासों के साथ नेत्रहीनता से निपटने में नीचे से उपर की ओर एक तंत्र की स्थापना करना था। देश भर के एनजीओ नेत्र अस्पतालों ने नेत्रहीनता से निपटने में बडे पैमाने पर काम किया जिससे नेत्रहीनता व्याप्ति में काफी कमी आई। 10वीं पंचवर्षीय योजना अवधि (2002-2007) के आखिर तक नेत्रहीनता व्याप्ति घटकर 1 फीसदी तक (रैपिड सर्वे 2006-2007) आ गई। 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि (2007-2012) के दौरान बडी उपलब्धियां -294.07 लाख कैटेरैक्ट शल्य चिकित्साएं की गईं। -27.19 लाख निशुल्क चश्मे वितरित किए गए - कार्नियल प्रत्यारोपण के लिए 2.21 लाख दान किए गए नेत्र संग्रहित किए गए। -बेहतर गुणवत्ता की नेत्र देखभाल सेवाएं प्रदान करने के लिए ऑप्थैलमोलोज ी के विभिन्न क्षेत्रों में 1850 नेत्र शल्य चिकित्सकों को प्रशिक्षित किया गया। 12वीं पंचवर्षीय योजना अवधि (2012-17) (नवंबर 2015 तक) -214.98 लाख कैटेरैक्ट शल्य चिकित्साएं की गईं। -23.06 लाख निशुल्क चश्मे वितरित किए गए - कार्नियल प्रत्यारोपण के लिए 1.93 लाख दान किए गए नेत्र संग्रहित किए गए। - बेहतर गुणवत्ता की नेत्र देखभाल सेवाएं प्रदान करने के लिए ऑप्थैलमोलोजी के विभिन्न क्षेत्रों में 1225 नेत्र शल्य चिकित्सकों को प्रशिक्षित किया गया। पूर्वोत्तर राज्यों में योजना का क्रियान्वयन सिक्किम समेत पूर्वोत्तर राज्यों में नेत्र देखभाल बुनियादी ढांचे का देखभाल इस कार्यक्रम के तहत एक प्राथमिकता वाला क्षेत्र बना हुआ है। केटेरैक्ट एवं नेत्र की अन्य बीमारियों की देखभाल करने के अतिरिक्त इन राज्यों में नेत्र देखभाल सेवाओं के विकास के लिए कई बड़े कदम उठाए गए हैं, जिनमें व्याप्ति क्षेत्र में तीव्रता लाने के लिए टेलीऑप्थैमोलोजी ईकाइयों की स्थापना करना एवं नेत्र देखभाल बुनियादी ढांचे के लिए जिला अस्पतालों में नेत्र ओटी/वार्ड्स का निर्माण शामिल है। निष्कर्ष आधुनिक परिष्कृत ऑप्थैलमिक उपकरणों, कुशल श्रमबलों, आईईसी की सघनता, सार्वजनि क क्षेत्र के अस्पतालों की मजबूती और विभिन्न नेत्र देखभाल गतिविधियों में एनजीओ नेत्र अस्पतालों की भागीदारी को शामिल करने के साथ यह कार्यक्रम 2020 तक देश में रोकथाम योग्य नेत्रहीनता के स्तर को कम करने के इसके अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में मजबूती से बढ़ रहा है तथा इसके 2020 तक 0.3 प्रतिशत के अपेक्षित स्तर को प्राप्त कर लेने की उम्मीद है। बुजुर्गो के स्वास्थ्य देखभाल के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीएचसीई) ‘बुजुर्ग व्यक्तियों पर राष्ट्रीय नीति’ में की गई अनुशंसाओं तथा ‘माता- पिता एवं वरिष्ठ नागरिक निर्वाह एवं कल्याण अधिनियम, 2007’ के तहत राज्यों की जवाबदेहियों को देखते हुए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने बुजुर्ग व्यक्तियों की विभिन्न स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान ‘बुजुर्गो के स्वास्थ्य देखभाल के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीएचसीई)’ की शुरूआत की। एनपीएचसीई के उद्देश्य इस प्रकार है: बुजुर्ग व्यक्तियों को रोकथाम योग्य, प्रोत्साहक योग्य, आरोग्यकारी एवं पुनर्वास सेवाओं की सुविधाएं प्रदान करना। समुदाय आधारित प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल दृष्टिकोण का लाभ उठाना तथा बुजुर्ग व्यक्तियों की परिवार के भीतर देखभाल के प्रचलनों के लिए चिकित्सा एवं अर्द्धचिकित् सा से जुड़े पेशेवर व्यक्तियों तथा कार्यवाहकों की क्षमता को मजबूत बनाना। बुजुर्गो व्यक्ति में स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान करना तथा एक मजबूत रेफरल बैकअप समर्थन के साथ समुदाय में उपयुक्त् स्वास्थ्य योजनाएं मुहैया कराना। जिला अस्पतालों, चिकित्सा महाविद्यालयों के जरिए बुजुर्ग मरीजों को रेफरल सेवाएं प्रदान करना तथा जराचिकित्सा के क्षेत्र में स्वास्थ्य श्रमबल विकास को मजबूत करना। हमारे देश में बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए उपचार प्रतिरूपों का विकास। इस कार्यक्रम की शुरूआत अक्टूबर, 2010 में 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि अर्थात 2010-11 एवं 2011-12 के आखिर में 21 राज्यों के 100 पिछड़े एवं सुदूर जिलों में की गई। 11वीं पंचवर्षीया योजना अविध के दौरान एनपीएचसीई की बड़ी उपलब्धि थी देश के विभिन्न क्षेत्रों में 8 चिन्हित क्षेत्रीय चिकित्सा संस्थानों (क्षेत्रीय जराचिकित्सा केंद्र) में 30 बिस्तरों वाले जराचिकित्सा विभाग की स्थापना एवं 21 राज्यों के 100 चिन्हित जिलों में जिला अस्पतालों, सीएचसी, पीएचसी एवं उपकेंद्र स्तर में समर्पित स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं मुहैया कराना। इस कार्यक्रम के तहत अभी तक चयनित 24 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों (104 जिलें शामिल) एवं सभी 8 क्षेत्रीय जराचिकित्सा केंद्रों (क्षेत्रीय चिकित्सा संस्थानों) को कोष जारी किए जा चुके हैं। प्रस्ताव रखा गया कि 12वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान कार्यक्रम के तहत शेष जिलों को चरणबद्ध तरीके से प्रतिवर्ष 100 जिलों के हिसाब से कवर किया जाएगा तथा देश में (पहले तीन वर्षों में) चयनित चिकित्सा महाविद्यालयों में 12 अतिरिक्त क्षेत्रीय जराचिकित्सा केंद्र विकसित किए जाएंगे। क्षेत्री य संस्थान जिला अस्पतालों में जराचिकित्सा इकाइयों को तकनीकी समर्थन मुहैया कराएंगे जबकि जिला अस्पताल सीएचसी, पीएचसी एवं उपकेंद्रों पर नीचे की गतिविधियों का पर्यवेक्षण एवं समन्वयन करेंगे। चिकित्सा महाविद्यालयों में जराचिकित्सा विभाग विकसित करना देश के विभिन्न क्षेत्रों में निम्नलिखित 8 क्षेत्रीय चिकित्सा संस्थानों (क्षेत्रीय जराचिकित्सा केंद्रों) का 2010-12 (11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि) में कार्यक्रम के तहत चयन किया गया है : 1. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली 2. चिकित्सा विज्ञान संस्थान, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश 3. शेर-ए कश्मीर आयुर्विज्ञान संस्थान, श्रीनगर , जम्मू और कश्मीर 4. गवर्नमें ट मेडिकल कॉलेज, तिरूवनंत पुरम, केरल 5. गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज, गुवाहाटी , असम 6. मद्रास मेडिकल कॉलेज, चेन्नई , तमिलनाडु 7. एसएन मेडिकल कॉजेज, जोधपुर, राजस्थान 8. ग्रांट्स मेडिकल कॉलेज एवं जेजे हॉस्पीटल, मुंबई, महाराष्ट्र 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के पहले तीन वर्षों के दौरान विकसित किए जा रहे 8 क्षेत्रीय जराचिकित्सा केंद्रों के अतिरिक्त देश में चुने हुए चिकित्सा महाविद्यालयों में 12 अतिरिक्त क्षेत्रीय जराचिकित्सा केंद्रों को विकसित करने का प्रस्ताव है। प्रस्तावित क्षेत्र एवं चिकित्सा महाविद्यालय इस प्रकार है: पंजाब, हरियाणा एवं चंडीगढ- पीजीआईएमईआर, चंडीगढ उत्तर प्रदेश- केजीआईएमएस, लखनऊ झारखंड- रांची मेडिकल कॉलेज, रांची पश्चिम बंगाल- कोलकाता मेडिकल कॉलेज , कोलकाता आंध्र प्रदेश-निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, हैदराबाद कर्नाटक- बेंगलुरू मेडिकल कॉलेज, बेंगलुरू गुजरात- बी.जे. मेडिकल कॉलेज, अहमदाबाद महाराष्ट्र- गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, नागपुर ओडिशा- एस.सी.ब. मेडिकल कॉलेज, कटक त्रिपुरा -अगरतल्ला मेडिकल कॉलेज, अगरतल्ला मध्य प्रदेश-गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल बिहार- पटना मेडिकल कॉलेज, पटना यह केंद्र अनुसंशित मामलो के लिए देखभाल का तृतीयक स्तर मुहैया कराएंगे, जराचिकित्सा के क्षेत्र में प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं अनुसंधान शुरू करेंगे। इन चिकित्सा महाविद्यालयों में से प्रत्येक में शैक्षणिक एवं अनुसंधान खंड के अतिरिक्त 30 बिस्तरों एवं ओपीडी सुविधाओं वाला एक जराचिकित्सा विभाग होगा। ये संस्थान जराचिकित्सा मेडिसिन में एमडी के लिए दो पीजी सीटों की शुरुआत सुनिश्चित करेंगे। इनके लिए समर्थन मुहैया कराया जाएगा। जराचिकित्सा विभाग के मौजूदा भवन और फर्नीचर के निर्माण/ नवीकरण / विस्तार। उपकरण और औजार वीडियो कान्फ्रेंसिंग यूनिट ड्रग्स और उपभोग्य अनुसंधान गतिविधियाँ मानव संसाधन (संविदा) जिला अस्पतालों से चिकित्सा महाविद्यालयों के संकाय सदस्यों और चिकित्सकों को प्रशिक्षण जिला अस्पताल चिन्हित जिला अस्पतालों को बुजुर्ग व्यक्तियों के प्रबंधन के लिए मजबूत/उन्नत बनाया जाएगा। इसमें बुजुर्ग व्यक्तियों की देखभाल के लिए प्रतिदिन के आधार पर जराचिकित्सा ओपीडी का संचालन किया जाएगा तथा इसमें 10 बिस्तरों वाला जराचिकित्सा वार्ड होगा। सभी जिला अस्पतालों में 100 बिस्तरों एवं अधिक की क्षमता वाली समर्पित फिजियोथेरेपी इकाई होगी। उप-जिला जराचिकित्साक्लिनिक की स्थापना चुने हुए जिलों के सभी सीएचसी एवं पीएचसी में की जाएगी। बुजुर्गों के लिए जरूरी दवाएं एवं उपकरण उपलब्ध कराएं जाएंगे। ए. समुदाय स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) जराचिकित्साक्लिनिक सीएचसी में एक सप्ताह में दो बार आयेाजित किए जाएंगे। एक पुनर्वास श्रमिक को बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए फिजियोथेरेपी एवं चिकित्सा पुनर्वासन सेवाओं के लिए अनुबंध पर नियुक्त किया जाएगा। बी. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद (पीएचसी) पीएचसी चिकित्सा अधिकारी बुजुर्ग व्यक्तियों के देखभाल के समन्वय, क्रियान् वयन एवं संवर्धन के लिए प्रभारी होगा। उप-केंद्र (एचसी): बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए स्वास्थ्य देखभाल करने के लिए एएनएम/पुरूष स्वास्थ्य कर्मचारी को प्रशिक्षित किया जाएगा। बुजुर्गों के लिए कुछ विशेष उपकरण एवं सहायता प्रदान की जाएगी। राष्ट्रीय प्रौढ़ केंद्र (एनसीए) : 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान राष्ट्रीय प्रौढ़ केंद्र के प्रस्ताव पर विचार नहीं किया जा सका। प्रस्ताव है कि दो राष्ट्रीय प्रौढ़ केंद्रों - एक नई दिल्ली में एवं एक चेन्नई में, जो क्रमश: एम्स एवं मद्रास मेडिकल कॉलेज से संबद्ध होंगे, के विकास को सहायता दी जाए। 2015-16 के दौरान उपलब्धियां आज की तरीख तक इस कार्यक्रम के तहत 24 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के 104 जिले शामिल हो चुके हैं। वित्त वर्ष 2014-15 तक इस उद्देश्य के लिए 17,544.71 लाख रुपए जारी किए जा चुके हैं। 2015-16 के लिए राष्ट्रीय बुजुर्ग स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम (एनपीएचसीई) के लिए अलग से किसी फंड का आवंटन नहीं किया गया है। एनपीएचसी ई की तृतीयक स्तर गतिविधियों को जारी रखने तथा विस्तारित करने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री एवं वित्त मंत्री की मंजूरी ली जा चुकी है। 02 राष्ट्रीय प्रौढ़ केंद्रों की स्थापना से संबंधित दिशा-निर्देश को सभी हितधारकों के परामर्श से अंतिम रूप दिया जा रहा है तथा राष्ट्रीय प्रौढ़ केंद्रों की स्थापना के लिए नई दिल्ली के एम्स एवं चेन्नई के एमएमसी को प्रशासनिक मंजूरी जारी की जा चुकी है। क्षेत्रीय जराचिकित्सा केंद्रों एवं एनपीएचसीई की जिला स्तरीय गतिविधियों से संबंधित दिशा- निर्देशों को भी अंतिम रूप दिया जा रहा है। एनपीएचसी ई के तहत 8 आरजीसी के संदर्भ में भौतिक एवं वित्तीय प्रगति का आकलन करने के लिए एक समीक्षा बैठक भी आयोजित की गई है। अपेक्षित परिणाम (31 मार्च, 2017 तक) : जराचिकित्सामेडिसिन में प्रतिवर्ष 40 पोस्टग्रेजुएट (एमडी) की क्षमता के साथ 20 संस्थानों की स्थापना बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए जिला अस्पतालों में अतिरिक्त 6400 बिस्तर एवं चिकित्सा महाविद्यालयों में 600 बिस्तर उपकेन्द्रों में बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए नि:शुल्क सहायता एवं उपकरण बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए बेहतर जीवन प्रत्याशा एवं जीवन स्तर राष्ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम एंव नियंत्रण कार्यक्रम भारत सरकार ने 2008-09 में देश में फ्लोरोसिस की रोकथाम एवं नियंत्रण के उद्देश्य से राष्ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम एंव नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीपीसीएसफ) की शुरुआत की है। अभी तक यह कार्यक्रम चरणबद्ध तरीके से 18 राज्यों के 111 जिलों तक विस्तारित किया जा चुका है। एनपीपीसीएफ के उद्देश्य : परियोजना की शुरुआत के लिए पीने की पानी एवं स्वच्छता मंत्रालय के फ्लोरोसिस के बेसलाइन सर्वे डाटा का संग्रह, आकलन एवं उपयोग चुने हुए क्षेत्रों में फ्लोरोसिस का व्यापक प्रबंधन एनपीपीसीएफ की रणनीति: समुदाय में फ्लोरोसिस की निगरानी प्रशिक्षण एवं श्रमबल समर्थन के रूप में क्षमता निर्माण चिकित्सा अस्पतालों में नैदानिक सुविधाओं की स्थापना गतिविधियां फ्लोरोसिस का ग्राम/ प्रखंड/ क्लस्टर वार सामुदायिक रोग निदान रोकथाम, स्वास्थ्य संवर्धन, नैदानिक सुविधाओं पुनर्निमित शलय चिकित्सा एवं चिकित्सा पुनर्वास के दृष्टिकोण से सुविधा मानचित्रण- ग्राम / प्रखंड/ जिला वार उपर्युक्त सूचीबद्ध रणनीतियों के अनुसार अंतरालों को भरने के लिए संगठन को भौतिक और वित्तीय सहायता और सुविधाओं में अंतरालों का विश्लेषण व्यक्तिगत मामलों का निदान और इसके लिए प्रबंधन प्रदान करना समुदायिक निदान के आधार पर सार्वजनिक स्वास्थ्य मध्यस्थता। आईईसी द्वारा व्यवहार परिवर्तन प्रशिक्षण राज्यों को प्रदत्त सहायता : स्थानिक जिलें में मानव शक्ति को मजबूत बनाना। सलाहकार प्रयोगशाला तकनीशियन 6 माह के लिए क्षेत्रीय जांचकर्ता (3) एक लोनमीटर सहित प्रयोगशाला के लिए उपकरण की खरीद विभिन्न स्तरों पर प्रशिक्षण स्वास्थ्य शिक्षा और प्रचार पुनर्संरचनात्मक शल्यचिकित्सा और पुनर्वास सहित उपचार नवीन जिलों के लिए कोष : ब्रेकअप के साथ 45 लाख रुपए का ब्यौरा इस प्रकार हैं: (लाख रुपए में) क्र.सं. गतिविधियाँ 12वीं योजना 1. एक सलाहकार के लिए प्रतिमाह वेतन/यात्रा और आकस्मिक व्यय सहित 6 माह के लिए 3 क्षेत्रीय जांचकर्ताओं का वेतन 9.00 2. जिला पुस्तकालय उपकरण (अनावर्तì 8) 10.00 3. प्रयोगशìला तकनीशियन/प्रतिमाह के वेतन सहित प्रयोगशाला निदान की सुविधा के लिए आवर्ती व्यय 3.50 4. जिला स्तर के चिकित्सा और उप- चिकित्सा प्रशिक्षण 3.00 5. जिला स्तर पर एक समन्वय बैठक 1.00 6. उपचार, शल्यचिकित् सा और पुनर्वास सहित फ्लोरोसिस मामलो का चिकित्सा प्रबंधन 15.50 7. स्वास्थ्य चिकित्सा और प्रचार 3.00 कुल 45.00 जिलों में जारी रखने के लिए - 20 लाख रुपए बजट आवंटन : 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए बजट 135 करोड़ रूपए है। वर्ष 2013-14 के लिए- 10.00 करोड़ रुपए वर्ष 2014-15 के लिए- 3.73 करोड़ रुपए वर्ष 2015-16 के लिए- 2.26 करोड़ रूपए करीब 50 व्यक्तियों (राज्य नोडल अधिकारी, जिला नोडल अधिकारी और जिला सलाहकार एनपीपीसीएफ) को प्रशिक्षित करने के लिए हैदराबाद के राष्ट्रीय पोषण संस्थान में प्रशिक्षकों के दो प्रशिक्षण आयोजित किए गए। फ्लोराइड और आर्सेनिक क्षेत्रों के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण एवं पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के द्वारा आईईसी के लिए एक संयुक्त रणनीति विकसित की जा रही है। इसे प्राप्त करने के लिए दोनों मंत्रालय के माननीय मंत्रियों और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के सचिवों की बैठकों का आयोजन किया गया। इसके उपरांत 13 मई, 2015 को दो विभागों के राज्य सचिवों के साथ दो मंत्रालयों के सचिवों की वीडियो वार्तालाप के माध्यम से बैठक हुई। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के साथ संयुक्त आईईसी अभियान के लिए 11 राज्यों के 50 जिलों की सूची बनाई गई। संबंधित राज्यों के क्षेत्रीय निदेशकों (एच और एफडब्ल्यू) के अलावा सभी प्रभावित राज्यों के एनपीपीसीएफ के राजय नोडल अधिकारियों के साथ 6 नवंबर, 2015 को नई दिल्ली में एक समीक्षा बैठक का आयोजन किया गया। आंध्र प्रदेश के प्रकासम और गुंटूर जिलों में एनपीपीसीएफ की समीक्षा बैठक का आयोजन किया गया, इसके उपरांत आर्सेनिक से प्रभावित पश्चिम बंगाल के 3 जिलों (नादिया, मुर्शिदाबाद, दक्षिण 24 परगना) में निदेशालय के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दौरा किया गया। मुख स्वास्थ्य कार्यक्रम भारत में मुख रोग काफी बड़ी मात्रा है और यह सर्वमान्य है कि मौखिक बीमारियां सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या हैं और इनका प्रणालीगत स्वास्थ्य पर काफी प्रभाव पड़ता है। कमजोर मुख स्वास्थ्य सुंदरता के साथ-साथ शारीरिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालने के साथ-साथ पीड़ादायी दर्द और इसके कारण से कार्य और उत्पादकता की हानि होती है। भारतीय दंत परिषद से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार एक अरब 21 करोड़ की आबादी में से 1,52,679 मामले दंत चिकित्सकों ने दर्ज किए हैं। हालांकि भारत में दंत चिकित्सा स्नातकों के बड़ी संख्या में सामने आने के बावजूद देश के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्य मौखिक बीमारियों के लिए सेवा प्रदाता नहीं है और इस प्रकार से ग्रामीण आबादी के करीब 72.6 प्रतिशत की उपेक्षा की जाती है। ग्रामीण जनसंख्या के लिए मुख स्वास्थ्य से जुड़े उपचार महंगा होने के कारण भी इसकी उपेक्षा की जाती है। मुख स्वास्थ्य के संबंध में स्वस्थ जीवनशैली को प्रोत्साहन देने पर भी विचार किए जाने की आवश्यकता है। विश्व स्वास्थ्य सभा ने 2005 में स्वास्थ्य संवर्धन और रोग निवारण रणनीतियों के लिए अन्य गैर-संचारी रोगों के साथ मुख स्वास्थ्य को भी शामिल किया है। उद्देश्य स्वस्थ आहार, मौखिक स्वच्छता सुधार आदि जैसे मुख स्वास्थ्य निर्धारकों में सुधार और ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या में मुख स्वास्थ्य पहुंच में असमानता को घटाना। जिला/उप- जिला अस्पतालों में मुख स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती प्रदान करने द्वारा मौखिक बीमारियों की रुग्णता को कम करना। सामान्य देखभाल व्यवस्था के साथ निवारक सेवाओं और मुख स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के साथ अन्य क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम (राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम, विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम, फ्लोरोसिस की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम, सीवीडी, मधुमेह और स्ट्रोक आदि की रोकथाम एवं नियंत्रण आदि) के साथ-साथ शिक्षा, सामाजिक कल्याण, महिला एवं बाल विकास आदि के क्षेत्र में मुख स्वास्थ्य के लिए कार्य करना। सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक- निजी भागीदारी (पीपीपी) को प्रोत्साहन। राष्ट्रीय मुख स्वास्थ्य कार्यक्रम देश में मुख स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार ने निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ मौजूदा स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में एककीकृत, व्यापक मुख स्वास्थ्य देखभाल को प्रदान करने के लिए एक राष्ट्रीय मुख स्वास्थ्य कार्यक्रम की पहल की गई हैं:- मुख स्वास्थ्य के निर्धारकों में सुधार के लिए मौखिक रोगों की रुग्णता कम करने के लिए सामान्य स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था के साथ मुख स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और निवारक सेवाओं को एककीकृत करने के लिए बेहतर मौखिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक- निजी साझेदारियों (पीपीपी) के संवर्धन को प्रोत्साहन देने के लिए। उपर्युक्त सूचीबद्ध उद्देश्यों को प्राप्त करने के क्रम में, भारत सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के विभिन्न स्तरों पर कार्यान्वित वर्तमान में जारी स्वास्थ्य कार्यक्रम के साथ दंत देखभाल के प्रावधानों को शामिल करते हुए राज्य सरकारों की सहायता करने का फैसला किया है। एक दंत चिकित्सा इकाई की स्थापना के लिए राज्य पीआईपी के माध्यम से कोषों को उपलब्ध करा दिया गया है। यह दंत इकाई दंत चिकित्सा कुर्सी और सहायता उपकरणों सहित आवश्यक प्रशिक्षित दंत चिकित्सकों, उपकरणों से लैस होगी। राज्य की स्वयं दंत चिकित्सा इकाइयों के स्तर के अनुसार यह इकाइयां जिला अस्पतालों के स्तर से नीचे की स्वास्थ्य सुविधाओं में अथवा जिला अस्पतालों में स्थापित की जा सकती है। श्रमशक्ति यदि श्रमशक्ति (जैसे दंत शल्यचिकित्सक, दंत सहायक और दंत स्वच्छता सहायक) की आवश्यकता हुई तो इन्हें अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया जा सकता है। उपकरण दंत चिकित्सा इकाई के लिए उपकरण जैसे दंत चिकित्सा कुर्सी, एक्सरे मशीन और अन्य सहायक उपकरणों को राज्य सरकारों से भी प्राप्त किया जा सकता है। उपभोग्य इकाई के लिए आवश्यक उपभोग्य उपकरणों की खरीद के लिए आवंटित कोषों का उपयोग किया जा सकता है। राष्ट्रीय मौखिक स्वास्थ्य प्रकोष्ठ बेहतर मुख्य स्वास्थ्य के लिए सामान्य स्वास्थ्य श्रमशक्ति के साथ-साथ मौखिक स्वास्थ्य श्रमशक्ति को प्रशिक्षण प्रदान करने में भी मदद करेगा। जागरूकता की स्तर को बढाने के क्रम में, भारत सरकार सूचनाओं के प्रसार के लिए विभिन्न प्रकार की सूचनाओं की तैयारी, शिक्षा और संचार सामग्री, व्यवहार परिवर्तन संचार सामग्री के लिए मदद प्रदान करेगी। राष्ट्रीय मौखिक स्वास्थ्य प्रकोष्ठ बेहतर मुख्य स्वास्थ्य के लिए सामान्य स्वास्थ्य श्रमशक्ति के साथ-साथ मौखिक स्वास्थ्य श्रमशक्ति को प्रशिक्षण प्रदान करने में भी मदद करेगा। जागरूकता की स्तर को बढाने के क्रम में, भारत सरकार सूचनाओं के प्रसार के लिए विभिन्न प्रकार की सूचनाओं की तैयारी, शिक्षा और संचार सामग्री, व्यवहार परिवर्तन संचार सामग्री के लिए मदद प्रदान करेगी। राष्ट्रीय मौखिक प्रकोष्ठ स्थापित तंत्रों के माध्यम से समय-समय पर कार्यक्रम की प्रगति और कार्यान्वयन की निगरानी करेगा। राष्ट्रीय मौखिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनओएचपी) को वित्तीय वर्ष 2014-15 में एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में प्रारंभ किया गया था। इस कार्यक्रम में दो पृथक गतिविधियां जैसे 1. एनएचएम के दायरे के अंतर्गत जिला स्तर तक की गतिविधियां 2. आईईसी के लिए क्षेत्रीय स्तर की गतिविधियां, प्रशिक्षण और अनुसंधान गतिविधियां शामिल हैं। एनएचएम घटक: ग्रामीण जनसंख्या के लिए कुशल मौखिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने हेतु दंत देखभाल बुनियादी ढांचे और श्रमशक्ति में सुधार के लिए राज्यों को स्वास्थ्य सुविधाएं (जिला स्तर और निम्नलिखित स्तरों) पर प्रदान करने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को एनओएचपी मदद प्रदान करता है। श्रमशक्ति सहायता (दंत चिकित्सक, दंत स्वच्छता चिकित्सा, दंत सहायक) दंत चिकित्सा कुर्सी उपकरण दंत प्रक्रियाओं के लिए उपभोज्य वित्तीय वर्ष 2014-15 की प्रगति 31 मार्च, 2015 को 9 राज्यों (हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, जम्मू और कश्मीर, मध्य प्रदेश, राजस्थान, सिक्किम, गुजरात, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश) के लिए कुल 1.72 करोड़ रुपए की धनराशि जारी की जा चुकी है। एनओएचपी को जिला, उप-जिला स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूदा दंत देखभाल इकाइयों में वृद्धि अथवा नई इकाइयों को प्रारंभ करने के लिए राज्यों/संघ शासित प्रदेशों की सहायता के योग्य बनाया जा चुका है। इस प्रक्रिया में 18 स्वास्थ्य सुविधाएं समुदाय में मुख स्वास्थ्य देखभाल सेवा को मजबूती प्रदान करने के लिए पूर्ण रूप से अथवा आंशिक तौर पर सहायता प्राप्त कर चुकी है। वित्तीय वर्ष 2015-16 की प्रगति सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों के लिए एनपीसीसी की बैठक का आयोजन किया जा चुका है और 28 राज्यों/संघ शासित प्रदेशों के प्रस्तावों पर एक कार्यक्रम के माध्यम से सहायता प्रदान करने के लिए विचार किया गया है। एनओएचपी के अंतर्गत गतिविधियों को सहायता प्रदान करने के लिए एनएचएम वित्त को 12.8 करोड़ रुपए की कुल स्वीकृति की अनुशंसा की जा चुकी है। अद्यतन, एनओएचपी को सहायता प्रदान करने के लिए एनएचएम प्रभाग द्वारा 27 राज्यों/संघ शासित प्रदेशों को 12.51 करोड़ रुपए की स्वीकृति की जानकारी दी जा चुकी है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद आईसीएमआर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के माध्यम से स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग डीएचआर) का उद्देश्य स्वास्थ्य अनुसंधान प्रणालियों के माध्यम से सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में इन अभिनवों को लाने और अन्य विभागों के साथ समन्वय के द्वारा मूल्यांकन/परीक्षण की सुविधाओं के माध्यम से नैदानिक, उपचार पद्धतियों से संबंधित अभिनवों को प्रोत्साहन देने के लिए लोगों के समक्ष अत्याधुनिक स्वास्थ्य तकनीकों को लाना है। स्रोत: पत्र सूचना कार्यालय