भारत सहित पूरे विश्व में कोरोना का प्रसार तेज होने के साथ ठीक होने वालों का प्रतिशत( भारत-52.95) भी बढ़ा है। इस बीच वैश्विक स्तर पर जारी हर्ड इम्यूनिटी के विभिन्न प्रयोग और प्रभावों को लेकर विश्व के वैज्ञानिक और डॉक्टर समुदाय में हर्ड इम्यूनिटी से जुड़े विभिन्न विचार-विमर्श जारी है। हर्ड इम्यूनिटी क्या है? हर्ड इम्युनिटी एक प्रकिया है जिससे किसी रोग के किसी समाज या स्थान पर फैलने की शृंखला को तोड़ने की कोशिश की जाती है। अन्य शब्दों में कम रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले और रोग प्रसार के सर्वाधिक जोखिम वाले लोगों में इसका प्रसार नियंत्रित करना है। सरल शब्दों में एक ऐसा प्रयोग जिसमें बेहद प्रभावशाली रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों से कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों का बचाव करना है। अन्य शब्दों में इम्यूनिटी किसी बीमारी की ऐसी स्थिति में जिसमें प्रभावित होने वाले लगभग 70-90 फीसद लोगों में बीमारी के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाए तो उनकी प्रतिरोधक क्षमता के उपयोग से बाकी लोग भी बच जाएं। लेकिन इसके लिए पहली शर्त इसकी वैक्सीन का होना जरूरी है। लेकिन सवाल यही है कि अभी तक कोरोना वारयस जैसी बीमारी में जिसमें तक कोई वैक्सीन नहीं काम कर पाई और वैक्सीन की अनुपलब्धता की स्थिति में क्या हर्ड इम्युनिटी की अवधारणा प्रभावी रहेगी? वैश्विक स्तर के प्रयास कोरोना की शुरुआत में ब्रिटेन द्वारा हर्ड इम्यूनिटी के प्रयोग को लेकर कुछ प्रयास किये गये । वैज्ञानिकों के समूह के विरोध और दिये गये सुझावों अनुसार सख्त प्रतिबंधों के बारे में राय दी गई, ‘हर्ड इम्यूनिटी’ जैसे विकल्प को यह कहकर अस्वीकार किया गया कि इससे बहुत सारे लोगों की जान को अनावश्यक खतरा हो सकता है। ब्रिटेन की सरकार द्वारा कुछ दिनों तक प्रयोग जारी रखने के बीच वहाँ राष्ट्रीय स्तर पर रोग से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या में बहुत ज्यादा वृद्धि हुई। शुरुआती प्रयास ब्रिटेन द्वारा जब अपने देश में हर्ड इम्यूनिटी का प्रयोग शुरु हुआ अन्य यूरोपियन देश स्वीडन द्वारा भी वैसे प्रयोग अपने देश में शुरु किये। प्रारंभिक स्तर पर स्वीडन को कुछ सफलता भी मिली, लेकिन वहां भी कोरोना के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। हर्ड इम्यूनिटी की पहली जरूरी शर्त है वैक्सीनेशन का होना, जिससे लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की इमरजेंसी सर्विस के प्रमुख डॉ. माइक रयान के अनुसार इस बारे में अभी पूरी तरह अनुमान लगा पाना बहुत मुश्किल है कि नए कोरोना मरीजों के ठीक होने के बाद उनके शरीर में जो एंटीबॉडी बनी है, वह उन्हें दोबारा इस वायरस के संक्रमण से बचा भी पाएगी या नहीं। विशेषज्ञों का मत विशेषज्ञों का मत है कि कोरोना वायरस से लोगों के बीच हर्ड इम्यूनिटी तभी विकसित हो सकती है जब लगभग किसी भी जनसंख्या 60 प्रतिशत हिस्सा संक्रमित हो जाए। हालांकि साठ प्रतिशत आंकड़े पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय हैं। इस वक्त पूरी दुनिया में सिर्फ स्वीडन में हर्ड इम्यूनिटी के परीक्षण अभी तक जारी हैं। वायरस प्रसार के शुरुआती दौर में आलोचनाओं के बाद ब्रिटेन को इसके परीक्षण के प्रयासों से पीछे हटना पड़ा। हर्ड इम्यूनिटी की वैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार किसी बीमारी के समूह के बड़े हिस्से में फैलने से इंसानों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बीमारी से लड़ने में संक्रमित लोगों की मदद करती है। बीमारी से लड़कर पूरी तरह ठीक होने वाले लोग बीमारी से ‘इम्यून’ हो जाते हैं। उनमें प्रतिरक्षात्मक गुण विकसित हो जाते हैं।प्रतिरक्षात्मकता का मतलब यही है संक्रमित व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता ने वायरस का मुक़ाबला करने में सक्षम एंटी-बॉडीज़ तैयार कर लिया। जैसे-जैसे ज़्यादा लोग रोग प्रतिरोधक होते हैं। और माना जाता है कि इससे संक्रमण फैलने का ख़तरा कम होता है। सामूहिक रोग प्रतिरोध क्षमता की महत्ता सामूहिक रोग प्रतिरोध क्षमता का अभाव ही महामारी का विस्तार करता है। महामारी विज्ञान के अनुसार किसी रोग का फैलाव वायरस या बैक्टीरिया की मारक शक्ति और मनुष्य की रोग प्रतिरोधक शक्ति पर निर्भर है। जिन्हें रोग का टीका या दवा मिल चुकी है, उनका और संक्रमित लोगों का अनुपात और वातावरण की स्वच्छता रोग के प्रसार के निर्णायक पहलू हैं। अगर वायरस या बैक्टीरिया की मारक क्षमता मनुष्य की रोग प्रतिरोधक शक्ति की अपेक्षा कमजोर है, तो रोग उत्पन्न नहीं होता है। अगर दोनों की शक्ति समान है, तो कुछ नहीं होता। जब किसी एक पक्ष की शक्ति में अपेक्षाकृत वृद्धि होती है तब संघर्ष शुरू हो जाता है। रोगाणु की मारक शक्ति उसकी संख्या, आक्रामकता, जनन-क्षमता तथा सामर्थ्य पर निर्भर करती है। समूह की रोग प्रतिरोधक शक्ति, प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिरोधक शक्ति को जोड़ने से बनी सामूहिक प्रतिरक्षा पर निर्भर करती है। महामारी का प्रकोप होने पर या तो लोग संक्रमित होकर मरते हैं, या निरोग हो जाने पर प्रतिरक्षित हो जाते हैं। ठीक होने वालों की संख्या बढ़ने से रोग प्रतिरोधी व्यक्तियों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ जाती है। ऐसा होते-होते एक दिन रोग प्रतिरोधक लोगों की संख्या रोगियों की संख्या से ज्यादा हो जाती है और महामारी नियंत्रित होकर कम या खत्म हो जाती है। यही हर्ड इम्यूनिटी का आधार है। ठीक होने वालों का प्रतिशत वर्तमान के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में लगभग 80 लाख मामलों में 40 लाख लोगों ठीक हुए हैं । भारत में ठीक होने वाले लगभग 52.95 फीसदी है। विश्व के अन्य देशों अमेरिका- 41 फीसद, चीन- 90, जर्मनी- 91, इटली- 74 और फ्रांस 46 प्रतिशत है।। लेकिन ये आंकड़े कुल संक्रमित लोगों की तुलना में हैं, न कि कुल आबादी की तुलना में। जबकि हर्ड इम्यूनिटी कुल आबादी की अवधारणा पर काम करती है। जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के मुताबिक हर्ड इम्यूनिटी तक पहुंचने के लिए 70 से 90 फीसदी आबादी का इम्यून होना जरूरी है। फिर भी वैज्ञानिकों को आशा है कि सामुदायिक स्तर पर महामारी पहुंची तो शायद हर्ड इम्यूनिटी काम आ जाए। लेकिन वैक्सीन की अनुपलब्धता/उपलब्धता की भी इसकी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका है। कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या (80 लाख) और सटीक दवा या वैक्सीन की अनुपलब्धता से हर्ड इम्यूनिटी अभी संभव होती नहीं दिख रही है। भारत और हर्ड इम्यूनिटी वॉशिंगटन स्थित सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी के डायरेक्टर और अमरीका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के सीनियर रिसर्च स्कॉलर डॉक्टर रामानन लक्ष्मीनारायण द्वारा इसे भारतीय संदर्भ में इसे समझाने के प्रयास के अंतर्गत बताया गया है कि भारत लॉकडाउन को बढ़ाते रहने और कोरोना वायरस के टीके का इंतज़ार करने की बजाय कोविड-19 को कंट्रोल करने की तरफ़ बढ़ सकता है जो कि हर्ड इम्यूनिटी नाम की वैज्ञानिक अवधारणा के ज़रिए संभव है। उनके अनुसार भारत की 65 प्रतिशत आबादी कोरोना वायरस से संक्रमित होकर ठीक हो जाए, भले ही संक्रमण के दौरान उनमें हल्के या ना के बराबर लक्षण हों, तो बाक़ी की 35 प्रतिशत आबादी को भी कोविड-19 से सुरक्षा मिल जाएगी। स्त्रोत : प्रियंका सौरभ, रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार।