परिचय किसी बीमारी का निदान करने का अर्थ है शरीर में उसकी जगह और कारण की पहचान करना या फिर उसे वैज्ञानिक नाम देना। उदाहरण के लिए जब हम कहते हैं कि बीमारी निमोनिया है तो हमें पता चला जाता है कि इसका कारण रोगाणु हैं (अधिकतर बैक्टीरिया) और इससे प्रभावित अंग फेफड़े हैं। इसका अर्थ यह भी है कि बीमारी आगे क्या रूप ले सकती है यह समझना। जैसे निमोनिया जैसी गम्भीर बीमारियों में। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान में सही रोगनिदान का अहम् महत्त्व है। आये दिन बढनेवाले तकनीकी प्रगती के बावजूद भी जानकारी और शारीरिक जॉंच का रोगनिदान के लिये अटूट महत्त्व है। अध्याय के इस भाग में हम कुछ आम लक्षणों के बारे में पढ़ेंगे जैसे बुखार, दर्द, मितली, पैरों का सूजना आदि। और लक्षणों के बारे में हम अलग अध्यायों में पढ़ेंगे। दर्द के प्रकार हम दर्द के विभिन्न प्रकारों की पहचान उनके होने के स्थान और प्रकृति के आधार पर इस तरह कर सकते हैं - 1. टीस मारनेवाला दर्द यह दर्द नाड़ी के साथ कम ज़्यादा होता रहता है। ये दर्द तीव्र शोथग्रस्त स्थिति में होता है (जैसे चोटों या फोड़ों आदि में), कुछ तरह का सिर का दर्द भी टीस मारता है।, टीस मारनेवाला दर्द नाड़ी के अनुसार रक्तचाप के हरक्षण बदलते रहता है (हम वस्तुत: इससे नाडी की गति गिन सकते है) 2. जलन वाला दर्द दर्द के अनेक प्रकार है, जैसे पेट में जलन अगर आन्तरिक या बाहरी सतह पर किसी तरह का शोथ हो तो इससे जलन वाला दर्द होता है। उदाहरण के लिए कीड़े के काटने पर या फिर असल में जलने पर या बहुत अधिक अम्ल बन जाने के कारण पेट में जलने के कारण, या फिर मूत्रमार्ग में से खिजाने वाला पेशाब के बाहर निकलने पर। जलन वाले दर्द का अर्थ है कि इसमें किसी अंग की आन्तरिक सतह में गड़बड़ी है। जलन वाला दर्द अक्सर एक जगह पर ही सीमित होता है; और इसस यह आसानी से पता चल जाता है कि कौन-सा अंग प्रभावित है। 3. ऐंठन वाला दर्द (शूल) अकडन या ऐंठन वाला दर्द (शूल) पेशियों में बहुत ज़्यादा सिकुड़न से होता है। ये जिन पेशियों में हो वो स्वैच्छिक (कंकाल) मॉंसपेशियॉं हो सकती हैं। इसके अलावा ये दर्द आन्तरिक अंगों की पेशियों में भी हो सकता है, जिससे हल्का दर्द, ऐंठन या गंभीर दर्द हो सकता है। कभी-कभी इससे प्रभावित व्यक्ति दर्द से कराहता है। पथरी को मूत्रवाहिनी में से निकालने के लिए या बच्चे के जन्म के समय गबिनी को सिकुड़ने में होने वाले दर्द इस प्रकार के दर्द के उदाहरण् हैं। दस्त और पेचिश में भी इस तरह का दर्द होता है। 4. हृदय (दिल) का दर्द जब हृदय की पेशियों में खून की आपूर्ति ठीक से नहीं होती तो एक खास तरह का पेशिये दर्द होता है। यह दर्द - जिसे हृद्शूल कहते हैं - दबाव डालने वाला या सिकुड़न वाला होता है। दिल का दौरा में बहुत ज़ोर का और स्थाई टिकने वाला दर्द होता है। दिल की पेशियें के कुछ ऊतकों के मर जाने के कारण ऐसा दर्द होता है। 5. हल्का दर्द हल्के दर्द में शरीर, सिर, पीठ आदि में दर्द और शरीर के विभिन्न भागों में तकलीफ आदि शामिल हैं। इस तरह के दर्द का अर्थ है कि इन अंगों या ऊतकों में थोड़ी सी गड़बड़ी है। पर हमेशा ही ऐसा नहीं होता। कभी-कभी फ्लू जैसे बिमारियॉं में भी सारे बदन में हल्का दर्द हो सकता है। 6. दर्द(शूल) यह दर्द एक स्थान से शुरू होता है और किसी और अंग तक जाता है। जैसे कि मूत्र वाहिनी में पथरी का दर्द आमतौर पर जनन अंगों तक जाता है। दिल में होने वाला दर्द अक्सर बाये हाथ तक जाता है। दाढ़ याने चर्वणक दॉंतों में होने वाला दर्द अक्सर कान तक जाता है। ऐसा तब होता है जब एक से ज़्यादा अंगों में एक ही तंत्रिका जा रही होती है। 7. कटने या चुभने वाला दर्द कटने वाला दर्द त्वचा कटने से जुड़ा होता है। जब पथरी में नुकीले कंकर मूत्रमार्ग या मूत्रवाहिनी में से गुज़रते हैं तब यह दर्द होता है। चक्कू लगने जैसा दर्द दिल का दौरा पड़ने या अग्नाशय के शोथ में महसूस होता है। चुभने वाला दर्द अक्सर गले में खराब होने और टॉन्सिल शोथ होने पर महसूस होता है। ये चुभने वाला दर्द किसी नुकीली चीज़ के बिना ही महसूस होता है। होम्योपैथी में इलाज के चुनाव के लिए दर्द का बहुत ही बारीक वर्गीकरण किया जाता है। दर्द या हल्के दर्द का इलाज हर दर्द को एक दवा हो यह सम्भव नहीं है। दूसरा हमें ये भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि दर्द सिर्फ लक्षण है जो हमें बीमारी की सूचना देता है। दर्द होने पर ज़रूरी यह होता है कि बीमारी खोजी जाए और उसका इजाज किया जाए। दर्द को हम कुछ न कुछ दवाइयों से कम कर सकते हैं। शोध के कारण मूलक दर्द में – (हल्के या धड़कन वाले) ऐस्परीन, आईबूप्रोफेन या पैरासिटामॉल से फायदा होता है। इन दवाओं से शरीर, सिर, जोड़ों आदि में होने वाले या पीड़ायुक्त मासिक धर्म के हल्के दर्द में भी फायदा होता है। जलन वाले दर्द या त्वचा में जलन के लिए सौम्य चीज़ों जैसे तेल या लोशन की उपयुक्त है। पेट की जलन अम्लता, और खट्टापन कम करने से कम हो जाता है। ज़्यादा पानी पीने (या पेशाब को तनु बनाने) से मूत्रमार्ग में होने वाली जलन को कम किया जा सकता है। इस जलन को कम रने के लिए खाने वाला सोडा या फेनाज़ोपायरिडीन भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। आन्तरिक अंगों में होने वाले ऐंठन वाले दर्द में एट्रोपिन और कुछ दवाओं से फायदा होता है। हृदशूल में खून की नलियों को फैलाने वाली दवाओं जैसे ग्लिसरिल ट्राईनाईट्रेट य सोरबिट्रेट उपयुक्त है। पैंटाज़ोसीन बहुत बुरे दर्द की स्थितियों जैसे दिल का दौरा पड़ने, हड्डी टूटने, शल्य चिकित्सा (ऑपरेशन) सिर में बहुत ज़ोर से दर्द होने और आन्तरांगों के बुरे दर्दों के लिए आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली एक दर्द निवारक दवा है। लेकिन इसे सिर्फ डॉक्टर ही प्रयोग कर सकते है। दर्द निवारक दवाएँ पूरी दुनिया में ये दवाएँ बहुत ज़्यादा इस्तेमाल होती हैं। पर इनके इस्तेमाल में सावधानी बरतनी चाहिए। कुछ दवाएँ दुष्परिणाम के कारण प्रतिबन्धित हैं जैसे कि ऐनालजीन। ऐस्परीन और आईबूप्रोफेन जैसी दवाएँ दमे से पीड़ित व्यक्ति के लिए काफी नुकसानदेह हैं। स्त्रोत: भारत स्वास्थ्य