परिचय बीमारियों के बाहरी कारकों के अलावा एक पहलू भी हैं कुछ बीमारियों प्रकीया में शरीर के भीतरी विकार से ही सम्बन्धित होता हैं। जैसे कि दात्र कोशिका अनीमिया एक आनुवंशिक बीमारी है। आनुवंशिक कारण बहुत से व्यक्तिगत कारणों से यह तय होता है कि किसी व्यक्ति को कोई बीमारी होगी या नहीं। या अगर होगी तो वो कितनी गम्भीर होगी। बीमारियों के बाहरी कारकों के अलावा एक ओर पहलू भी हैं, जो शरीर के भीतरी कारणो से उसकी अनुवंशिक संरचना से सम्बन्धित होता हैं। कुछ बीमारियों के लिए आनुवंशिक बनावट महत्वपूर्ण होती है पर सब बीमारियों के लिए नहीं। जैसे कि डायबिटिस एक आंशिक रूप से आनुवंशिक बीमारी है। रहन-सहन सम्बन्धी कारक व्यक्ति का रहन सहन उसका भोजन, अधिक काम, तनाव, नींद, शराब, सिगरेट, और अन्य व्यवसन, शिक्षा, व्यवसाय और व्यायाम शामिल है। व्यक्ति के रहन सहन व आदतो में बदलाव के कारण बहुत सारी मुख्य स्वास्थ्य समस्या जैसे टी बी, कोढ़ मलेरिया और दस्त से अपने आप ही मुक्ति मिल जाती है या फिर गैरसंक्रामक रोग जैसे डायबिटिस, ब्लड प्रेशर और कैसर रोग आदि को जन्म देता है। रहनसहन मे परिवर्तन इन बिमारीयों के नियंत्रण में काफी सहायक भूमिका निभाते है। जअपकर्षक (डिजनेरेटिव) बीमारियाँ अन्तर्जात बीमारियों (कोशिकाओं में आन्तरिक बदलाव) में अपकर्षक (डिजनेरेटिव) बीमारियाँ की एक महत्वपूर्ण श्रेणी है बुढ़ापे में धीरे-धीरे होने वाले सभी बदलाव असल में अपकर्षक प्रवृति के होते हैं यह ऊतकों के उम्र अधिक हो जाने के कारण होते हैं। धमनियों का सख्त हो जाना, जोड़ों में दर्द रहना, मोतियाबिन्द, कम दिखने लगना या कम सुनाई देने लगना आदि सब अपजनिक बदलाव हैं। परन्तु अपजनिक बदलाव केवल बुढ़ापे से सम्बन्धित ही नहीं होते। कुछ अपजनिक बीमारियाँ समय से पहले ही हो सकती हैं जैसे कि गठिया (रूमेटिक बीमारियाँ)। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में इन बीमारियों का खास कुछ इलाज नहीं है। इनमें से बहुत सी बीमारियाँ शल्य चिकित्सा (आपरेशन) द्वारा ठीक की जाती हैं। अरक्तता की दिल की बीमारियाँ इसका एक उदाहण हैं। पौर्वात्य चिकित्सा शास्त्र इस तरह की बीमारियों के ठीक होने का दावा करता है। होम्योपैथी में भी इस क्षेत्र में सम्भावनाएँ मिलती हैं। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में इनमें से कुछ बीमारियों का इलाज तो नहीं है पर इनके बढ़ने से रोकने के तरीके उपलब्ध हैं। जैसे कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप आदि रोगो पर नियंत्रणकिया जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि विटामिन ई और विटामिन सी से अपजनिक बीमारियों को कम करने में मदद मिलती है। एंटीआक्सीडेंट तत्व का प्रयोग इसमें फायदेमंद साबित हुआ है। असल समाधान रहन-सहन में बदलाव - सही पोषण, कसरत,सही मानसिक सोच और तनाव रहित जीवन में है। स्वाईन फ्लू के उदाहरण से हम इस विवरण को ज्यादा आसानी से समझ पायेंगे। गत वर्षस्वाईन फ्लू की बीमारी देश में कई शहरों में फैल गयी थी। स्वाईन फ्लू के विषाणू याने वायरस होते है, जिनके पर अक्सर बदलते रहते है। कुछ प्रकार ज्यादा जानलेवा होते उनके एन्टीजन विशेष भी कुछ कुछ बदलते रहते है, जिसके कारण प्रतिरोधी वॅक्सीन बताना भी खास उपयोगी नही। इन बदलते तेवरो के कारण स्वाईन फ्लू की गतिविधियॉं बदलती रहती है। इधर वातावरण में भी ठंड-गरमी आदि मौसम के कारण स्वाईन फ्लू का फैलाव ज्यादा या कम होता है। ठंड में ये वायरस ज्यादा टिक पाते है, जिससे बीमारी का फैलाव ज्यादा होता है। गरमी के दिनो में इनका टिक पाना मुश्किल होता है, इसलिये बीमारी कम होती है। अब मनुष्य को देखे तो हर किसी को स्वाईन फ्लू नही होता। बच्चे इसकी चपेट में ज्यादा आते है, और बूढे भी। बच्चों में इस फ्लू वायरस के प्रति प्रतिपिंड अबतक बने नही होते और बुढों में प्रतिपिंडों की मात्रा घटती है। इसलिये उम्र और बीमारी का नाता देखा जाता है। जहॉं भीड ज्यादा, वहाँ फैलाव भी ज्यादा है, क्योंकी यह वायरस छींक के द्वारा हवा में और फिर साँस के रास्ते शरीर में पहॅुच कर बिमारी पैदा करता है। पर खास बात यह है कि यह एक ही बार में भीड़ में बहुत सारे लोगो तक एक ही समय में फैलता है। टीकाकरण और विशिष्ठ रक्षण स्वास्थ्य के खतरों के विरूध परपोषक की प्रतिरक्षा की संकल्पना टीकाकरण और अन्य विशिष्ठ व्यक्तिगत प्रतिरक्षक सुरक्षा उपाय है । । अन्य उपायों में मुँह-नाक पर पर्दा लगाना (मास्क), कानों में रूई डालना, सुरक्षित कपड़े पहनना, मच्छरदानियॉं आदि टीकाकरण के अलावा सभी व्यक्तिगत सुरक्षा के उपाय है। बीमारियों का वर्गीकरण भारत में शरीर के विभिन्न भागों के संक्रमण और पर्याकरण(इनफेस्टेशन) बीमारियों के सबसे आम कारण हैं। कुल बीमारियों में से लगभग आधी इन्हीं संक्रमण और पर्याकरण(इनफेस्टेशन) कारणों से होती हैं। असंक्रामक बीमारियों के अलावा बीमारियों के अन्य समुह हैं व्यपजनिक बीमारियाँ, स्वरोगक्षम, स्व-प्रतिरक्षा-दोष जन्मजात, आनुवंशिक, कुपोषण सम्बन्धी, ढॉंचागत गड़बड़ियॉं, कैंसर और अनजाने कारणों से होने वाली बीमारियाँ। बहुत सी बीमारियों में कोई भी स्थायी संरचनात्मक विकृति के बगैर हो सकती है। दमा, कब्ज़, अधसीसी (माईग्रेन) और बहुत सी मानसिक बीमारियाँ इसी श्रेणी में आती हैं। आम बीमारियाँ ज़्यादातर संक्रमण श्रेणी में से हैं। और वो भी पॉंच या छ: शारीरिक तंत्रों और अंगों से सम्बन्धित जो बाहरी पर्यावरण का सामना करते हैं। ये तंत्र और अंग हैं पाचन, श्वसन, त्वचा, कान, आँखें और जनन अंग। मान लीजिए कि हम पामा (स्कैबीज़) के बारे में कुछ पता करना चाहते हैं। ये बीमारी त्वचा के स्तम्भ और संक्रमण/जीवाणु बाधित की पंक्ति (रो) में मिलेगी। जगह की कमी के कारण हम इस तालिका में सभी बीमारियों को शामिल नहीं कर पाए हैं। पर आप देखेंगे कि वो सभी बीमारियाँ जिन से आए दिन हमारा सामना होता है इसमें शामिल हैं। सभी तरह के कारणों से होने वाली आहार तंत्र से सम्बन्धित सभी बीमारियों पहले स्तम्भ में मुँह, गला और पाचन तंत्र के अन्तर्गत रखी गई हैं। अगर आप शरीर के किसी भी भाग से सम्बन्धित संक्रमण या जीवाणु बाधित बीमारियों के बारे में जानना चाहते हैं तो आप केवल पहली पंक्ति देख लें। उदाहरण के लिए तपेदिक हालॉंकि संक्रमण से होता है परन्तु कुपोषण एक तरह से इसे आंमत्रित करता है। इसी तरह से दमा एक क्रियाकारी गड़बड़ी है परन्तु एलर्जी और आनुवंशिक कारण इस पर असर डालते हैं। स्त्रोत: भारत स्वास्थ्य