परिचय फाल्सिपेरम मलेरिया का होना खतरनाक होता है। जिसको उसी क्षण से इलाज करना जरुरी है। इसके लिये आजकल सभी स्वास्थ्य कर्मी और आशाओं के पास ए.सी.टी. इलाज उपलब्ध है। इसका तीन दिन का किट आता है। बच्चों से लेकर वयस्कों तक उम्र के अनुसार इसके चार किट मिलते है। वैसे तो यह किट की किमत लगभग १५० रु. है लेकिन सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में यह मुफ्त है। इसके साथ बुखार के लिये पॅरासिटामोल दवा भी दी जाती है। इससे बीमारी का बिलकुल सही तरीके से इलाज होता है। लेकिन क्लोरोक्वीन दवा से यह परजीवी अब काबू में नही आ सकते ऐसा पाया गया है। इसलिये क्लोराक्विन के बजाय अब सरासर ए.सी.टी. इलाज का अवलंब होता है। इन इलाकों में खून के जाँच में फाल्सिपेरम के बजाय व्हायवॅक्स परजीवी पाया गया तो क्लोरोक्विन के तीन दिन के और प्रायमाक्विन के १४ दिन के इलाज किये जाते है। रोकथाम दक्षिण ओदिशा में हमने देखा की स्वास्थ्य कर्मी-आशा के पास जाँच और इलाज के किट उपलब्ध होना और जानकारी द्वारा जागरण के प्रभाव से फाल्सिपेरम मलेरिया को लगभग रोक लग गयी है। इसके लिये निम्नलिखित उपाय कारगर साबित हुए है। बीमारी की जल्दी जाँच और तुरंत उपचार- इससे मच्छर परजीवी को दुसरे व्यक्ती के खून में संक्रमण कर नही सकते और संक्रमण रुक जाता है। सामान्य मच्छरदानी ३-३ महीनों में कीटनाशक से भीगोकर इस्तेमाल कर सकते है। मच्छर कटने से बचाव करने के लिये मच्छरदानी का इस्तेमाल अब काफी प्रचलित है। सरकार के द्वारा कीटनाशक युक्त मच्छरदानी घर घर में दी गयी है। सामान्य मच्छरदानी भी कीटनाशक (केओथ्रिन ) में भिगोकर इस्तेमाल कर सकते है, जिसका असर तीन महीनों तक रहता है। सरकारी मच्छरदानी का कीटनाशक १-२ बरस तक या बीस धुलने तक कायम रहता है। इन मच्छरों को रात के ८-१० बजे से लेकर सुबह ५-६ बजे तक कांटने की आदत होती है इसलिये मच्छरदानी में सोनेवालों को पूरा समय संरक्षण मिलता है। फाल्सिपेरम मलेरिया की रोकथाम के लिये ये सबसे प्रभावी साधन साबित हो चुका है। इसपर जब मच्छर बैठते है तब घंटे-दो घंटे में कीटनाशक के प्रभाव पर मर कर गिरते है यह हम देख सकते है। मच्छरदानी ठीक से लगाना और मच्छर को अंदर न आने देना यह बिलकुल जरुरी है। इन इलाकों में नीम के बीजों का तेल निकालकर अन्य तेल में मिलाकर त्वचा पर फासने से २-३ घंटों तक मच्छर दूर रहते है ऐसा अनुभव है। शाम से लेकर रात में सोने तक इसका अच्छा उपयोग हो सकता है। वैसे ही नीम के पत्तों को चुल्हे में जलाकर धुआं करना मच्छरों को कुछ समय घर से बाहर भगा सकता है। इसका भी प्रयोग हम कर सकते है। दरवाजों को वायरमेश लगाकर मच्छरों को रोक सकते है घर के दरवाजे और खिडकीओं को वायरमेश लगाकर मच्छरों को बाहर ही रोकना और एक प्रभावशाली उपाय है। कुछ गॉंवों में इसका प्रयोग हुआ है, साथ में छत के ठीक करने की भी जरुरत है। इन दरवाजों को स्प्रिंग और मॅग्नेट के प्रयोग से हमेशा ढकने की अवस्था में हम रख सकते है। कीटनाशक छिडकने के लिये पंप फाल्सिपेरम ग्रस्त इलाकों में सरकारी स्वास्थ्य सेवा द्वारा कीटनाशक डीडीटी या अन्य रासायनिक छिंडकना एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पद्धती है। कीटनाशक छिंडकने का यह प्रयोग घर के अंदर करना चाहिये ना कि बाहर। क्यों कि मच्छर अंदर बैठकर रात में काटते है। दीवारों पर यह कीटनाशक छ: महीने तक टिका रहता है। इसके प्रभाव से मच्छर दुष्प्रभावित होकर चंद घंटों में मर जाता है। लेकिन ज्यादातर परिवार अंदर से कीटनाशक छिडकाने को विरोध करते है जिसके कई कारण हो सकते है। स्वास्थ्य कर्मी और आशाओं के द्वारा इसके लिये सही जानकारी और जागरण जरुरी है। हर वर्ष में दो बार यह मुहीम चलती है। मच्छर पनपने को रोकना यह भी एक काम है। लेकिन मच्छर के प्रजाती के अनुसार पनपने की जगह बदल सकती है। दक्षिण ओदिशा की ऍनाफिलीस प्रजाती धान के खेतों में रहते पानी में या धीरे से बहते झरनो और कॅनहरों में पनपती है। इसलिये इस प्रजाती का पनपना रोकना इतना आसान नही। फिर भी हफ्ते में एक बार गाँव के इर्दगीर्द के ऐसे पानी के स्त्रोत नष्ट कर देना अच्छा होगा। वैसे ही यह मच्छर १.५ कि.मी. तक घूमकर प्रभावित करता है। इसलिये इसको घर में आने को रोकना और मच्छरदानी आदि का इस्तेमाल ज्यादा अहम् है। ऍनाफिलीस की दूसरी प्रजाती बरसात में भरे गड्ढो में पनपती है। उनके लिये इनको खानेवाली मछलियों-गप्पी या गंबुजिया का प्रयोग हम कर सकते है। यह एक आसान और प्रभावी तरिका है। ये न हो तब उस पानी पर क्रूड ऑईल का अंश छिडकाकर मच्छर के इल्लियों का श्वसन रोकने का और एक उपाय उपलब्ध है जो आसान भी है। क्रूड ऑईल के बजाय पॅरीस ग्रीन जैसा रसायन भी काफी असरदार है। बच्चों में फाल्सिपेरम परजीवी अक्सर पाया जाता है। इन जिलों में हुए अध्ययन के अनुसार ६०% बच्चों में वैसे ही इस परजिवी का अस्तित्व देखा गया है, बुखार हो ना हो। हॉंलाकि इन में से कुछ बच्चों में बुखार आदि लक्षण होते है। यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य निकला है और बालकुपोषण के साथ उसको जोडा जा सकता है। इसलिये सब बच्चों की खून की जाँच और जरुरी हो तब ए.सी.टी इलाज करना अनिवार्य है। इसी के साथ रोकथाम के सारे उपाय करते रहना जरुरी है। तीन बरस के इस उपायों के बाद बच्चों में फाल्सिपेरम परजीवी का प्रमाण अब १०% के नीचे गिर गया है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता के पास दवा पेटी फाल्सिपेरम मलेरिया एक भयंकर त्रासदी मानी जाती थी लेकिन दक्षिण ओदिशा मे किये इन उपायों के जरिये हम काफी हद तक इसको रोक सकते है यह साबित हुआ है। इसी के चलते फाल्सिपेरम मलेरिया से संबंधित गंभीर बीमारियॉं मौते, कुपोषण और बुखार का प्रचलन भी कम हुआ है। इस उदाहरण को हम अन्य राज्यों में ला सकते है। स्त्रोत: भारत स्वास्थ्य