भूमिका प्रभावित जनसंख्या में 5-10 हजार में से 1 बच्चे को हीमोफीलिया की संभावना है। हीमोफीलिया में आतंरिक तथा बाह्य रक्त स्त्राव के कारण मांसपेशियाँ तथा शरीर के जोड़ सबसे अधिक प्रभावित होते है। कभी-कभी मस्तिष्क में रक्त स्त्राव होने सेब्रेन डेमेंज तथा मृत्यु भी हो जाती है। पूर्व में प्रभावित बच्चों का औसत जीवन 11 वर्ष होता था जो कि उचित उपचार से अब 50-60 वर्ष तक हो सकता है। विश्व हीमोफीलिया दिवस खून बहने संबंधी अन्य विकारों और हीमोफीलिया रोग के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए प्रत्येक वर्ष सत्रह अप्रैल को मनाया जाता है। हीमोफीलिया आनुवंशिक रोग है। यह खून के थक्के बनने की क्षमता को प्रभावित करता है। इससे पीड़ित व्यक्ति को सामान्य व्यक्ति की तुलना में, चोट लगने पर अधिक मात्रा में खून बहता है। इस बीमारी से महिलाओं की तुलना में पुरुषों के प्रभावित होने की संभावना अधिक है। यह दो रूपों में होता हैं – “हीमोफीलिया ए अथवा हीमोफीलिया बी”। यह दोनों रूप थक्के के आठ या नौ घटकों की कमी पर निर्भर करते हैं। विकार का सबसे सामान्य रूप “हीमोफीलिया ए” है। यह प्रति पांच से दस हजार जन्मे बच्चों में से किसी एक को जन्म के समय होता है। “हीमोफीलिया बी” लगभग प्रति बीस से चौंतीस हजार जन्मे बच्चों में से किसी एक को जन्म के समय प्रभावित करता हैं।(स्रोत:नेशनल हेल्थ पोर्टल) हीमोफिलिया क्या है हीमोफिलिया एक प्रकार का रक्त विकार है। हीमोफिलिया से ग्रसित लोगों में चोट इत्यादि लगने के पश्चात् लंबे समय तक रक्त स्राव होता है। ऐसे मरीजों के रक्त में क्लॉटिंग फैक्टर्स की कमी होती है। क्लॉटिंग फैक्टर एक प्रोटीन होता है जो कि रक्त स्राव को नियंत्रित करता है। हीमोफिलिया एक दुर्लभ बिमारी है, 10,000 में से एक व्यक्ति इस रोग से प्रभावित होता है। हीमोफिलिया के सबसे प्रमुख प्रकार को ''हीमोफिलिया ए'' कहा जाता है, इसमें व्यक्ति में क्लाटिंग फैक्टर viii पर्याप्त मात्रा में नहीं होता है। हीमोफिलिया का एक अन्य प्रकार भी होता है जिसे ''हीमोफिलिया बी '' कहा जाता है, जिसमें फैक्टर ix की कमी हो जाती है। हीमोफिलिया ए व हीमोफिलिया बी के परिणाम समान है अर्थात इन व्यक्तियों में सामान्य से अधिक समय तक रक्त स्त्राव होता है। हीमोफिलिया कैसे होता है हीमोफिलिया एक जन्मजात रोग है, यह किसी प्रकार की छुआछूत की बीमारी नहीं है। हीमोफिलिया सामान्यतः वंशानुगत बीमारी है, जो कि माता पिता के जीन द्वारा संचारित होती है। जीऩ शारीरिक विकास एवं विशिष्टता के लिए संदेश वाहक होते है। कभी कभार हीमोफिलिया बिना किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि के भी हो सकता है, इसे स्पोअर्डिक हीमोफिलिया कहते है। लगभग 30 प्रतिशत मामलों में हीमोफिलिया माता-पिता के जीऩ से न होकर व्यक्ति के स्वयं के जीऩ में बदलाव होने की वजह से होता हैं। हीमोफिलिया किस प्रकार से वंशानुगत होता है यदि पिता को हीमोफिलिया है, परन्तु माता को नहीं ऐसी स्थिति में कोई भी पुत्र हीमोफिलिया से ग्रसित नहीं होगा, परंतु समस्त पुत्रियां हीमोफिलिया जीऩ के लिए वाहक होगी। यदि माता हीमोफिलिया जीऩ के लिए वाहक है, तो 50 प्रतिशत पुत्रों में हीमोफिलिया होने की संभावना होगी तथा 50 प्रतिशत पुत्रियों का हीमोफिलिया जीऩ के वाहक होने की संभावना होगी। स्त्रियों में हीमोफिलिया तभी संम्भव है जब पिता को हीमोफिलिया हो तथा माता हीमोफिलिया जीऩ की वाहक हो, जो कि असामान्य है। हीमोफिलिया की तीव्रता के स्तर हीमोफिलिया की तीव्रता के तीन स्तर हैं - हीमोफिलिया की तीव्रता व्यक्ति के रक्त में क्लाटिंग फैक्टर की मात्रा में कमी पर निर्भर करती है। सामान्य- फैक्टर viii या फैक्टर ix की 50 - 150 प्रतिशत क्रियाशीलता । माईल्ड हीमोफिलिया (फैक्टर की 5-30 प्रतिशत क्रियाशीलता )- शल्य चिकित्सा या गंभीर चोट के पश्चात् लम्बे समय तक रक्त स्त्राव होना। रक्त स्त्राव की समस्या नहीं भी हो सकती है। मॉडरेट हीमोफिलिया (फैक्टर की 1-5 प्रतिशत क्रियाशीलता )- शल्य चिकित्सा, गंभीर चोट या दंत शल्य प्रक्रिया के पश्चात् लम्बे समय तक रक्त स्त्राव होना। माह में एक बार रक्त स्त्राव की घटना होना। कभी कभार अस्पष्ट कारणों से रक्त स्त्राव होना। सीवियर हीमोफिलिया (क्लाटिंग फैक्टर की 1 प्रतिशत से कम क्रियाशीलता )- मांसपेशियाँ व जोड़ों (घुटने, कोहनी, ऐड़ी) में रक्त स्त्राव होना। अस्पष्ट कारणों से सप्ताह में 1 या दो बार रक्त स्त्राव की घटना होना। हीमोफिलिया के लक्षण हीमोफिलिया ए तथा बी के समान लक्षण होते हैः- बड़े-बड़े चोट के निशान बन जाना। मांसपेशियाँ एवं जोड़ों (मुख्यतः घुटने, कोहनी तथा ऐडी़ )में रक्तस्त्राव होना। अस्पष्ट कारणों से शरीर के अंदर अचानक स्वतः रक्तस्त्राव होना। शल्य चिकित्सा, चोट इत्यादि के पश्चात् सामान्य की तुलना में अधिक समय तक रक्त स्त्राव होना। जोड़ों एवं मांसपेशियों में रक्तस्त्राव के लक्षण जोड़ों में दर्द या अजीब सा एहसास होना। सूजन आ जाना। जोड़ों में अकड़न। चलने फिरने में समस्या। सामान्यतः रक्तस्त्राव कहाँ होता है हीमोफिलिया से ग्रसित व्यक्ति में रक्तस्त्राव शरीर के अंदर या बाहर दोनों जगह हो सकता है। एक ही जोड़ में बार-बार रक्तस्त्राव होने से जोड़ क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। इसके अलावा अन्य समस्याओं जैसे कि आथ्राइटिस हो जाती है जिससे चलने फिरने व सामान्य क्रियाकलापों करने में कठिनाई होती है। हालांकि अन्य आथा्रइटिस के प्रकारों की तुलना में हीमोफिलिया सामान्यतः हाथ के जोड़ों को प्रभावित नहीं करता है। हीमोफिलिया का उपचार वर्तमान में हीमाफिलिया का इलाज अत्यंत प्रभावशाली है। अल्पमात्रा में मौजूद क्लाटिंग फैक्टर को रक्त प्रवाह में इंजेक्ट किया जाता है। पर्याप्त मात्रा में क्लाटिंग फैक्टर रक्तस्त्राव को रोक देता है। रक्तस्त्राव का त्वरित इलाज त्वरित इलाज से जोड़ो, मांसपेशियाँ एवं अन्य अंगों को क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सकता है। रक्त स्त्राव तुरंत रोकने से रक्त के घटकों की आवश्यकता भी कम रहेगी। संदेह होने पर भी इलाज- असमंजस की अवस्था में भी इलाज शुरू कर देना चाहिए, जोड़ों के सूजने या किसी अन्य प्रकार के लक्षण आने का प्रतिक्षा नहीं करना चाहिए। हांलाकि हीमोफिलिया से ग्रसित व्यक्ति को रोगमुक्त नहीं किया जा सकता परंतु उपयुक्त इलाज से उन्हे सामान्य स्वस्थ जीवन दिया जा सकता है। उपचार के अभाव में हीमोफिलिया से ग्रसित व्यक्तियों के लिए सामान्य क्रियाकलाप अत्यंत कठिन होते हैं, वे शारीरिक रूप से अक्षम हो सकते है या अल्प आयु में मृत्यु भी हो सकती है। उपचार कब करना चाहिए उपचार निम्न अवस्थाओं में शुरू कर देना चाहिए- जोड़ों में रक्त स्त्राव। मांसपेशियाँ मुख्यतः भुजा या पैर में रक्त स्त्राव। गला, मुख जुबान, चेहरे या नेत्रों में चोट लगना। सिर में गंभीर चोट लगना या असाधारण रूप से सिर में दर्द होना। शरीर के किसी भी भाग से भारी व लगातार रक्त स्त्राव होना। गंभीर दर्द या सूजन आ जाना। सभी खुले हुए घाव जिनमें टांके लगाने की आवश्यकता है तथा किसी भी प्रकार की दुर्घटना जिसमें रक्तस्त्राव होने की संभावना है। निम्न परिस्थियों में पूर्व उपचार आवश्यक है- शल्य चिकित्सा जिसमें दंत शल्य चिकित्सा भी शामिल है। वे क्रियाकलाप जिनमें रक्त स्त्राव की संभावना हो सकती है। उपचार संभवतः कब आवश्यक नहीं है? हीमोफिलिया से ग्रसित बच्चों में छोटे घाव के निशान आम बात है, पंरतु ये सामान्यतः घातक नहीं होते हैं। हालांकि सिर पर चोट के निशान घातक हो सकते है तथा चिकित्सकीय परामर्श वांछित है। छोटी चोटों व खरोचों से रक्त स्त्राव सामान्य व्यक्ति के समान ही होगा अतः सामान्यतः ये घातक नहीं होती है। दिशा निर्देश हीमोफिलिया से ग्रसित व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण दिशा निर्देश रक्त स्त्राव का त्वरित उपचार। स्वस्थ रहे। एस्प्रीन जैसी औषधियों का प्रयोग न करें। हीमोफिलिया के उपचार में सक्षम चिकित्सक एवं नर्स से परामर्श लें। मांसपेशियाँ में सुई ना लगायें। दांतों का खयाल रखें। मूलभूत प्राथमिक उपचार की जानकारी रखें। फीटल हीमोग्लोबिन (एफ) की जाँच हीमोग्लेबिन एफ को कई विधियों से नापा जा सकता है, अधिकतर विधियां इसके एल्कली रेजिस्टेंट होने पर आधारित हैं। हीमोग्लोबिनोंपैथीज़ जैसे सिकिल सेल एनीमिया एवं थैलेसीमिया इत्यादि के डायग्नोसिस के लिए रक्त में हीमोग्लोबिन एफ की उपस्थिति एवं मात्रा की जांच आवश्यक एवं महत्वपूर्ण होती है। इसके लिए रूटीन में एल्कली डिनेचुरेशन विधि से जांच की जाती है। रिएजेन्टस- सोडियम हायड्रोक्साइड (एन ओ एच )0.083एन (एन/12) ताजा बना कर उपयोग किया जाता है। संतृप्त एमोनियम सल्फेट 500 एम.एल. में 2 एम.एल. कन्संटे्रटेड एच.सी.एल. मिलाकर बनाया जाता है। क्लोरोफार्म (हीमोलायसेट बनाने के लिये)। हीमोलायसेट बनाने की विधि एन्टी कोएगुलेंट जैसे इ.डी.टी.ए. के साथ लिए गये रक्त को सेंट्रिफ्यूज करके रेड पैंक सेल्स को नार्मल सेलाइन (सोडियम क्लोराइड 0.9%) से तीन बार वाश करने के पश्चात् एक वाल्यूम रक्त एक वाल्यूम डिस्टिल्ड वाटर एवं 0.5 एम.एल क्लोरोफार्म मिलाकर दो मिनट शेक करने के पश्चात् 3000 आर.पी.एम. पर 20 मिनट के लिए सेन्ट्रीफ्यूज किया जाता है। इसके बाद ऊपर की हीमोग्लोबन की लेयर निकाल ली जाती है, इसको हीमोलायसेट कहते हैं। इसके पश्चात् इसका हीमोग्लोविन नाप कर इसे 10% पर एडजस्ट करते हैं। इसको फ्रीज करके स्टोर किया जा सकता है। हीमोग्लोबिन एफ के परिक्षण व नापने की विधि 3.2 एम.एल. 0.083 एन या एन/12 सोडियम हायड्रोक्साइड (एन ओ एच ) टेस्ट ट्यूब में लेकर इसमें 0.2 एम.एल. हीमोलायसेट मिलाया जाता है एवं स्टॉप वाच शुरू की जाती है, एक मिनट पश्चात् 6.8 एम.एल. प्रेसिपिटेटिंग रीएजेन्ट (संतृप्त अमोनियम सल्फेट) मिलाया जाता है व हिलाकर एक मिनट पश्चात् वाटमेंन न. 1 फिल्टर पेपर से फिल्टर किया जाता है। अगर फिल्टे्रट कलर लैस होता है, तो हीमोग्लोबिन नार्मल व्यस्क है या इसमें फीटल हीमोग्लोबिन नहीं है। अगर फिल्टे्रट लाल या भूरा है तो इसमें हीमोग्लोबिन एफ(फीटल) हैं। इसके पश्चात् फिल्टे्रट में हीमोग्लोबिन एफ की मात्रा (प्रतिशत ) निकाली जाती है, जिसके लिए 10 एम.एल. 0.04 % अमोनियम साल्यूशन (या डी डबल्यू) में 10 माइक्रोलीटर (0.01 एम.एल.) मिलाकर स्टेंडर्ड बनाते हैं। इसके पश्चात् स्टेडर्ड व टेस्ट (फिल्टे्रट) की रीडिंग वाटर ब्लेंक के अगेन्सट 540 एन.एम. वेव लैंथ पर लेते हैं। कैलकुलेशन हीमोग्लोबिन एफ = टेस्ट की रीडिंग /स्टेंडर्ड की रीडिंग ग् 5 (या एल्कली रेजिस्टेंट हीमोग्लोबिन) नार्मल व्यस्क ब्लड में हीमोग्लोबिन एफ 0.5 से 1.7 प्रतिशत तक आ सकता है। जबकि विभिन्न विकारों के अनुसार 70 से 80 प्रतिशत तक फीटल हीमोग्लोबिन आता है। सिकल सेल ट्रेट में नार्मल व्यक्ति की तरह फीटल हीमोग्लोबिन होता है। सिकल सेल एनिमिया में यह 2.0 प्रतिशत से24 प्रतिशत तक हो सकता है। सिकलिंग टेस्ट 2 प्रतिशत सोडियम मेंटाबाय सल्फाइड डिस्टिल वाटर में फ्रेशली बनाया हुआ। ब्लड सेम्पल ई.डी.टी.ए. या आक्सलेटेड में लिया हुआ। 20 माइक्रो लीटर ब्लड सेम्पल व स्लाइड पर 20-40 माइक्रो लीटर 2 प्रतिशत सोडियम मेंटाबाई सल्फाइड रीएजेन्ट मिलायें इसके बाद इसको कवर स्लिप से कवर करने के पश्चात् उसके किनारे पर अधिक मात्रा में आए साल्यूशन को फिल्टर पेपर से सोखने के पश्चात् डी.पी.एक्स. या पेट्रोलियम जेली से किनारे सील करें।हाई पावर आब्जेक्टिव में माइक्रोस्कोप में 15, 30, 60 मिनट पश्चात् देखें 2 घण्टे के अन्तराल पर भी देखें। सिकलिंग हसिया या केले के आकार की रेड सेल्स 15 मिनट से 60 मिनट में दिखती हैं। सिकिल सेल ट्रेट में यह अधिक समय ले सकती है। (18 घण्टे) नेस्ट्रोफ टेस्ट नेकेड ऑय सिंगल टियूब रेड सेल आसमाटिक फ्राजिलिटी टेस्ट यह टेस्ट हीमोग्लोबिन संबंधित विकारों की प्रारम्भिक स्क्रीनिंग जांच करने हेतु होता है।प्रमुख तौर से बी β (बीटा) थेलेसिमीया मानर या ट्रेट के लिये इसका उपयोग किया जाता है। यह अत्यधिक संवेदनशील, सस्ती एवं कम समय में होने वाली जाँच है। सैंपल - ई.डी.टी.ए. वायल में ब्लड लें। रिएजेंट - सोडियम क्लोराइड डायसोडियम फास्फेट सोडियम हायड्रोजन फास्फेट सर्वप्रथम 5 एम.एल. 0.35 प्रतिशत सेलाइन सोल्युशन दो टेस्ट ट्यूब में लिया जाता है। कन्ट्रोल ट्यूब में 0.02 एम.एल., ब्लड नार्मल व्यक्ति का मिलाते हैं। (2.5 एम.एल. (डिस्टिलड वाटर),में 20 माइक्रोलीटर, ब्लड) दूसरी टेस्ट ट्यूब में 0.02 एम.एल. रक्त मरीज का मिलाते हैं। दोनों ट्यूबस को मिक्स करते हैं व आधे घण्टे रखने के पश्चात् इन ट्यूबों के पीछे व्हाइट पेपर गहरी काली लाईन के साथ रखते हैं।कंट्रोल ट्यूब में काली लाईन साफ दिखाई देती है, किन्तु टेस्ट केस में लाइन साफ नहीं दिखती। थेलेसिमिया ट्रेट में ब्लैक लाइन साफ नहीं दिखती क्योंकि माइक्रोसिटिक हायपोक्रामिक सेल्स लायसिस के लिए रेजिस्टेंट होती है। (यह सेट्रिफ्यूज करने पर नीचे देखी भी जा सकती है।) नार्मल नार्मोसिटिक सेल्स लायसिस के लिए रेजिस्टेट नहीं होती इस कारण पूरी तरह से लाइज हो जाती है। यह टेस्ट थेलेसिमिया स्क्रीनिंग के लिए उपयोगी है। इसके आधार पर जब यह पॉजिटिव होता है। तो इन केसेस में एचबीए 2 एस्टिमेंशन किया जाता है। थेलेसिमिया ट्रेट को और कनफर्म करने के लिए नेस्त्रोफ्ट टेस्ट आयरन डेफिशियेंसी एनीमिया व कुछ अन्य हीमोग्लोबिन विकारों पॉजिटिव आ सकता है। एचबीए2 एस्टिमेंसन 3.6 से 8 प्रतिशत तक होने पर थेलेसिमिया ट्रेट के लिए डायग्नास्टिक है, पर साथ में आयरन डेफिशियेंसी होने पर यह 3.6 से कम आ सकता है। हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरसिस हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरसिस हीमोग्लोबिनोपेथीज को डायग्नोज करने के लिए महत्वपूर्ण जांच है। सामान्यतया इलेक्ट्रोफोरेसिस हेतु एल्केलाईन (पीएच 8.4) बफर मीडियम अधिक उपयोगी होता है| एल्केलाइन (8.4) पी.एच. पर इलेक्ट्रोफोरेसिस सालिड मीडियम के इस्तेमाल के आधार पर कई प्रकार का हो सकता है, जैसे सेलूलोज एसिटेट स्टार्च अगर जेल एगेरोज जेल अगर जेल अगर जेल एवं एल्केलाइन मीडियम (8.4 पी.एच.) के द्वारा एबनार्मल हीमोग्लोबिन को अलग करने और पहचानने की बहुत कारगर विधि है। उपकरण व रीएजेन्टसः- 1. इलेक्ट्रोफोरेटिक टेंक (होरीजेन्टल) व पावर सप्लाई 2. फिल्टर पेपर। 3. एपलिकेटर- कवर स्लिप काटकर तैयार किया गया। 4. एगार जेल प्लेट बनाने के लिऐ माइक्रोस्कोप ग्लास स्लाइड व अगर जेल 5. स्टेनिंग का सामान व ओवन 6. वेईंग बेलेन्स व पी.एच. मीटर 7. इलेक्ट्रोफोटिक बफर- ट्रिस बफर- (हायड्रो आक्सी मीथाइल)- एमाइनो मीथेन- 10.2 ग्राम, इथाईलीन डायएमीन टेट्रा एसिटिक एसिड (ई.डी.टी.ए.) 0.6 ग्राम बोरिक एसिड 3.2 ग्राम- 1लीटर डिस्टिल वाटर में बनाया हुआ बफर 40डिग्री से.ग्रे. पर स्टोर किया जा सकता है और खराब हुए बिना कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है। 8. एमाईडो ब्लैक स्टेन (1 प्रतिशत मीथेनाल में बना हुआ) 9. डी स्टेनिंग (या काउन्टर स्टेनिग) सोल्यूसन 5 प्रतिशत एसिटिक एसिड। 10. मीथेनाल 11. 2 प्रतिशत एसिटिक एसिड सोल्यूसन स्लाइड को और रिन्स करने के लिए। जेल प्लेट बनाना एक ग्राम अगर पावडर 100 एम.एल. ट्रिस बफर में मिलाकर बायलिंग वाटर बाथ में 10 से 15 मिनट गर्म करके पिघलाते हैं व इसके पश्चात् ग्लास स्लाइड को समतल सतह पर रखकर पिपेट से हर स्लाइड पर 5 एम.एल. गर्म अगर डालते हैं जिससे वह बराबर फैल जाये इसके बाद उसे ठण्डा कर सेट होने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसे फ्रेद्गा बनाया जाता है। हांलाकि इसे पेट्री डिश में गीले फिल्टर पेपर पर रखकर गीला करके फ्रिज में स्टोर किया जा सकता है। इलेक्ट्रोफोरेसिस विधिः- 1. इलेक्ट्रोफोरेसिस चैम्बर के कम्पार्टमेंट ट्रिस बफर द्वारा भर दिये जाते हैं। फिल्टर पेपर को गीला करके दोनों ओर रख दिया जाता है। 2. अगर प्लेट पर पेशेंट का सेम्पल हीमोलायसेट बना हुआ 1 से 3 माइक्रोलीटर एप्लीकेटर द्वारा लगभग 1.5 से.मी. प्लेट के एक सिरे से लगाया जाता है। सेम्पल के साथ नार्मल कन्ट्रोल या एबनार्मल कन्ट्रोल हीमोलायसेट भी लगा दिया जाता है। 3. स्लाइड या प्लेट को फिल्टर पेपर पर टेंक में दोनों ओर छूते हुये अगर साइड नीचे करके रखा जाता है। सेम्पल व कन्ट्रोल जहां लगे होते हैं वह निगेटिव इलेक्ट्रोड की तरफ रखे जाते हैं। जिससे सेम्पल पॉजिटिव इलेक्ट्रोड की ओर बढ़ते है या मूव करते हैं। इसके पश्चात् कान्सटेट करन्ट प्रवाह पावर सप्लाई से किया जाता है जो 10 एम.ए. हर स्लाइड के लिए होता है। लगभग एक घण्टे में हीमोग्लोबिन्स का सेपरेशन हो जाता है। इसके बाद करन्ट प्रवाह बन्द करके प्लेट निकाल कर स्टेनिग की जाती हैं। इसके लिये एमाइडो ब्लैक स्टेन में एगार प्लेट को डुबो कर 2 से 10 मिनट तक रखा जाता है कि निकाल कर 5 प्रतिशत एसिटक एसिड सोल्यूसन में लगभग 2 घण्टे से या 6 घण्टे रातभर डुबोकर रखा जाता है फिर इसको 2 प्रतिशत एसिटक एसिड से और रिन्स करके साथ किया जाता है। इसके बाद हीमोग्लोबिन बैंड साथ दिखने लगते हैं। इसके बाद प्लेट को रूम टेम्परेचर पर सुखाते है या ओवन में 800 डिग्री से.ग्रे. पर 1 से दो घण्टे में सुखा लेते हैं। एल्केलाइन पी.एच. पर इस विधि से हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरिसस करने से एच बी ए, एच बी ए 2, एच बी एफ, एच बी एस, एच बी ई, एच बी एच, एच बी बार्ट्स, एच बी सी,व अन्य हीमोग्लोबिन सेप्रेट हो जाते हैं व पहचाने जा सकते हैं किन्तु जिनकी मोबिलिटी एक जैसी होती उनके लिए अन्य विधियों का उपयोग किया जाता है। स्रोत: लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग,मध्य प्रदेश सरकार|