<h3 style="text-align: justify;">भूमिका</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-left" title="सिकिल सेल एनीमिया " src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/health/diseases/90593e92894193593e90293693f915-92c94092e93e93093f92f93e902/90592894193593e90293693f915-93091594d924-93593f91593e930-92e93e93094d91792693094d93693f91593e/sikl.jpg/@@images/daedf63e-b20b-4f54-adcf-0061d99c64c3.jpeg" alt="सिकिल सेल एनीमिया " width="218" height="166" /></p> <p style="text-align: justify;">हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं का प्रमुख घटक है, जिसका कार्य शरीर में आक्सीजन का संचार करना है जो शरीर की मेंटाबोलिक क्रिया के लिए आवश्यक होता है। हीमोग्लोबिन की सरंचना पॉलीपेप्टाइड चेन-ग्लोबिन तथा हीम से मिलकर होती है तथा यह अनुवांशिक नियंत्रण में होती है। इस अनुवांशिक सरंचना में खराबी आने से कई रक्त विकार हो जाते है। ग्लोबिंन चेन की संरचना अनुवांशिक रूप से डिफेक्टिव होने से जो रक्त विकार होता है, उसको थैलेसीमिया कहते है तथा ग्लोबिन चेन की अमिनोएसिड संरचना में असमानता से रक्त कोशिका के स्वरूप में बदलाव आता है, उसे सिकिलसेल एनिमिया कहते है।</p> <p style="text-align: justify;">शरीर के अंदर रक्तप्रवाह निरन्तर रहता हैं किन्तु चोट लगने पर या आन्तरिक रक्तशिराओं के फटने पर रक्त स्त्राव को रोकने के लिए एक थक्का जम जाता है, जिससे रक्त का स्त्राव बन्द हो जाता है। इस थक्के को जमाने के लिए रक्त में कई कारक होते है जिनकी कमी के कारण रक्त का थक्का जम नहीं पाता है और रक्त स्त्राव होता रहता है। इस रक्त विकार को हीमोफिलिया कहते है, जिसका संचार अनुवांशिक होता है, लड़कियां इस विकार को आगे बढा़ती है तथा पुरूष संतानों को यह रोग होता है।</p> <p style="text-align: justify;">थैलेसीमिया, सिकिलसेल एनीमिया एवं हीमोफीलिया की रोकथाम हेतु प्रभावित क्षेत्रों में प्रभावित जन समूहों का सर्वेक्षण, प्रभावित परिवारों का चिन्हिकरण, आवश्यक नैदानिक सुविधाएं तथा जेनेटिक काउन्सिलिंग प्रमुख कार्य है।</p> <h3 style="text-align: justify;">सिकिल सेल एनीमिया</h3> <p style="text-align: justify;">सिकिलसेल एनीमिया एक अनुवांशिक रक्त रोग है, जिसमें लाल रक्त कोशिकाओं में सामान्य हीमोग्लोबिन के स्थान पर एच.बी.एस. हीमोग्लोबिन होने के कारण लाल रक्त कोशिकाएं आक्सीजन के अभाव में हसिया के आकार की हो जाती है। सिकिलसेल एनीमिया के लक्षण शिशु अवस्था में सामने आने लगते है इसमें रक्त कोशिकाएं टूटने लगती है, जिसके कारण हल्का पीलिया होने से बच्चे का शरीर पीला दिखाई देता है। तिल्ली बढ़ जाती है किन्तु निरन्तर रक्त प्रवाह अवरुद्ध होने के कारण छोटी भी हो जाती है। रक्त गाढ़ा होने के कारण स्थानीय तौर पर छोटे-छोटे थक्के बनते रहते है जिससे शरीर के विभिन्न अंग प्रभावित होते है।</p> <h3 style="text-align: justify;">सिकिलसेल एनीमिया के प्रकार</h3> <p style="text-align: justify;">1. सिकिल सेल</p> <p style="text-align: justify;">डिसीजः-इसमें माता एवं पिता दोनों ही बीमारी के वाहक होते है तथा ग्रसित शिशु में इस बीमारी के लक्षण तीन माह से एक वर्ष की आयु में दिखने लगते है।</p> <p style="text-align: justify;">2. सिकिल सेल</p> <p style="text-align: justify;">ट्रेट- इसमें माता एवं पिता में से कोई एक बीमारी का वाहक होता है। प्रायः इस बीमारी के लक्षण पता भी नहीं चलता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">सिकिल सेल एनीमिया की अनुवांशिकता</h3> <p style="text-align: justify;">मध्यप्रदेश में इससे सबसे ज्यादा प्रभावित अनुसूचित जन-जाति-प्रधान, पनिका, बरेरा, भिलाला तथा अनुसूचित जाति झारिया, मेंहरा तथा डेहरिया प्रमुख रूप से प्रभावित है। पिछडें वर्ग में यादव, कुर्मी, काक्षी, लोधी, रंजक आदि में भी यह रक्त विकार पाया जाता है। अनुमानतः प्रदेश में प्रभावित जनसंख्या में 1000 व्यक्तियों में 08 सिकिलसेल एनिमिया से प्रभावित होते है, जिनकी संखया लगभग 1.12 लाख है। प्रदेश में सिकिलसेल एनिमिया ग्रसित लगभग 3500 बच्चे प्रतिवर्ष जन्म लेते है। सबसे ज्यादा प्रभावित जिले, शहडोल, मण्डला, बडवानी, मन्दसौर, रीवा, जबलपुर, छिन्दवाडा, बैतूल, खरगोन, धार, झाबुआ। मध्यम प्रभावित जिले, बालाघाट, सिवनी, होद्गांगाबाद, देवास इंदौर तथा उज्जैन है रोग का प्रभाव रतलाम, नीमच, द्गयोपुर, मुरैना, ग्वालियर, दमोह तथा सतना में भी है। 1970 में सिकिलसेल एनिमिया प्रभावित रोगियों की औसत आयु 14 वर्ष थी जो टीकारोधक बीमारियों की रोकथाम, एन्टीबायोटिक प्रोफायलेक्सिस, रक्ताधान तथा उन्नत निदान तकनीकों की उपलब्धता के कारण अब औसत आयु 42 वर्ष तक हो सकती है।</p> <h3>सिकिल सेल एनिमिया के लक्षण एवं जटिलताएं</h3> <p style="text-align: justify;">सिकिलसेल रक्त विकार में रक्त कोशिकाओं के टूटने तथा रक्त प्रवाह के अवरुद्ध होने के कारण निम्न प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैः-</p> <p style="text-align: justify;"> </p> <ul> <li>संक्रमण में वृद्धि</li> <li>पक्षाघात</li> <li>पित्त की थैली में पथरी</li> <li>हडि्‌डयों में रक्त संचार रूकने से परिगलन</li> <li>शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का कम होना</li> <li>लिंग में रक्त का प्रसार नहीं होना</li> <li>हडि्‌डयों में संक्रमण</li> <li>गुर्दे में खराबी</li> <li>पांव में घाव होना</li> <li>रेटिना में खराबी आने से दृष्टि बाधित होना</li> <li>गर्भवती महिला के शिशु में वृद्धि का रूकना</li> <li>गर्भपात तथा प्रिएकलेम्पशिया</li> <li>शरीर में प्रायः दर्द होना</li> <li>हार्टफेलियर की स्थिति निर्मित होना</li> </ul> <p style="text-align: justify;">सिकिल सेल क्राईसिस -यह अवस्था पांच प्रकार की हो सकती हैः-</p> <ul> <li>वासोऑक्लूसिव क्राईसिस</li> <li>स्पीलिनिक क्राईसिस</li> <li>एक्यूट चेस्ट सिन्ड्रोम</li> <li>एप्लास्टिक क्राईसिस</li> <li>हीमोलेटिक क्राईसिस</li> </ul> <p style="text-align: justify;">सीवियर एनीमिया होने पर 5 से 7 दिन में स्थिति गंभीर हो जाती है। लाल रक्त कोशिकाओं के असमान्य (हसिया के आकार का) होने के कारण कैपिलरीज़ (छोटी रक्त धमनियों) में रक्त का प्रवाह रूक जाता है। जिसके कारण से शरीर के अंगों में</p> <p style="text-align: justify;">रक्त का संचार रूकने के कारण तीव्र दर्द होता है और अंगों में विकृति होती है। इस क्राईसिस की अवधि के रोगी में विभिन्न प्रकार के इन्फेक्शन तथा पानी की कमी होने पर स्थिति और गंभीर हो जाती है।</p> <p style="text-align: justify;">रक्त के प्रवाह के अवरुद्ध होने के कारण इसका गंभीर प्रभाव तिल्ली के उपर भी पड़ता है। जिसके कारण से अचानक तिल्ली वृद्धि के साथ दर्द होता है। फेफडों में भी रक्त के प्रवाह अवरुद्ध होने के कारण से साँस तेजी से चलने लगती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">सिकिल सेल एनीमिया का निदान</h3> <p style="text-align: justify;">स्क्रीनिंग -</p> <p style="text-align: justify;">1. सिकलिंग टेस्ट</p> <p style="text-align: justify;">इस प्रक्रिया के माध्यम से चुने हुए जनसमूहों में हीमोग्लोबिन संबंधी विकारों के वाहक होने की संभावना की जांच की जाती है। इन जन समूहों में जांच स्कूली छात्र, छात्रायें, विवाह पूर्व युवक एवं युवतियों में तथा गर्भधारण के पूर्व की जानी चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">2. गर्भ में बच्चे की जांच</p> <p style="text-align: justify;">यदि माता तथा पिता दोनों ही सिकिलसेल जीन के वाहक हो तो गर्भ में बच्चे के रक्त की या अमिनिओटिक फ्लूइड या कोरियोनिक विलाई सेपलिंग के माध्यम से गर्भ में ही इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">सामान्य लेबोरेटरी जाँच</h3> <p style="text-align: justify;">1. कम्पलीट ब्लड पिक्चर</p> <p style="text-align: justify;">इसमें सामन्यतः हीमोग्लोबिन का स्तर 6 से 8 ग्राम % होता है साथ में रेटिकुलोसाईट्‌स की संखया बढ़ी हुई मिलती है।</p> <p style="text-align: justify;">सन्दर्भ प्रयोगशाला में की जाने वाली जाँच</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस -इस प्रक्रिया से एचबीएस हीमोग्लोबिन पहचाना जा सकता है।</li> <li>हाई परफोर्मेंस लिक्विड क्रोमाटोग्राफी- यह जांच सिकिलसेल डिजीस के पुष्टिकरण के लिए महत्वपूर्ण है।</li> <li>जेनेटिक टेस्टिंग -मालिक्यूलर जांचें जैसे कि डीएनए विशलेषण जिससे की कठिन चिकित्सकीय मामलों का निदान किया जा सकता है। इस जांच की आवश्यकता कदाचित ही होती है।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">उपचार एवं देख-रेख</h3> <p style="text-align: justify;">सिकलसेल एनीमिया में निम्नलिखित उपचार के विकल्प अत्यन्त उपयोगी हैः-</p> <p style="text-align: justify;">फॉलिक एसिड एवं एन्टीबॉयोटिक का उपयोग</p> <p style="text-align: justify;">जिन बच्चों में सिकिलसेल डिसीज होते है, उन बच्चों को शिशु रोग विशेषज्ञ की देख-रेख में रखना चाहिए। इन रोगियों प्रारम्भ से 1 मिली.ग्राम प्रतिदिन फोलिक एसिड आजीवन लेना होता है।</p> <p style="text-align: justify;">हाइड्राक्सी यूरिया का उपयोग</p> <p style="text-align: justify;">सिवियर एनीमिया में इस औषधि का उपयोग किया जाता है। जिससे रोगी की बीमारी का नियंत्रण होता है तथा जीवन अवधि में भी वृद्धि होती है। इन औषधियों को चिकित्सा विशेषज्ञ की निगरानी में लिया जाना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">क्राईसिस में उपचार</p> <p style="text-align: justify;">वॉजो ऑक्लूसिव क्राईसिस में दर्द दूर करने वाली औषधि जैसे कि ओपियम डेरीवेटिव्स दी जाती है। कम प्रभावित रोगियों को डाईक्लोफिनेक टेबलेट अथवा नेप्रोक्सन टेबलेट दी जाती है। गंभीर रोगी को भर्ती करके उपचार किया जाता है। सांस में तकलीफ होने पर आक्सीजन दी जाती है तथा रक्ताधान या एक्चेंज रक्ताधान भी किया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">बोनमैरो ट्रांसप्लान्ट</p> <p style="text-align: justify;">सिकिलसेल डिसीज में यह कारगर होता है, विशेषकर बच्चों के लिए प्रभावशाली उपचार है। सिकिलसेल डिसीज का पूरी तरह से इलाज मात्र इसी पद्धति से संम्भव है, परन्तु यह विधि अत्यधिक खर्चीली है तथा इसकी सुविधा हमारे देश में चुनिंदा शहरों में ही उपलब्ध होने के कारण अधिकांश जनता को इसका लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">रक्ताधान</h3> <p style="text-align: justify;">इस चिकित्सकीय परिस्थिति में रक्ताधान की आवश्यकता जीवन के प्रारम्भिक काल में यदा-कदा होती है तथा नियमित रक्ताधान बाद के जीवन काल में आवश्यक हो सकती है।</p> <p style="text-align: justify;">कभी-कभी रक्ताधान की आवश्यकता निम्न परिस्थियों में हो सकती हैः</p> <ul> <li style="text-align: justify;">हीमोलिसिस जो कि किसी संक्रमण या धमनियों में गंभीर रूप से अवरोध उत्पन्न होने के कारण होती है।</li> <li style="text-align: justify;">पारवो वायरस बी-19 के संक्रमण के कारण क्षणिक रूप से बोनमैरो की गतिविधि का रूक जाना।</li> <li style="text-align: justify;">रक्त का स्पलीन में रूक जाना</li> <li style="text-align: justify;">स्ट्रोक</li> <li style="text-align: justify;">एक्युट चेस्ट सिन्ड्रोम</li> <li style="text-align: justify;">मल्टी आर्गन फेल्योर</li> <li style="text-align: justify;">शल्य चिकित्सा</li> <li style="text-align: justify;">प्रायपिज्म</li> </ul> <p style="text-align: justify;">उपरोक्त परिस्थितियों में एक्सचेन्ज ट्रान्सफ्यूजन ज्यादा उपयोगी है तथा इससे लौह तत्व का अधिभार भी कम होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">नियमित रक्ताधान की आवश्यकता के संकेत</h3> <p style="text-align: justify;">• बार-बार होने वाले स्ट्रोक की रोकथाम के लिए मुख्यतः उन बच्चों में जिनमें ट्रान्सक्रेनियल डापलर टेस्ट से पता चला हो कि उनमें स्ट्रोक का खतरा अधिक है।</p> <p style="text-align: justify;">• पल्मोनरी उच्च रक्तचाप एवं ह्रदय की कार्यक्षमता कम हो जाना।</p> <p style="text-align: justify;">• लंबे समय से हो रहा दर्द या बीच-बीच में होने वाला गंभीर दर्द जो कि हाइड्राक्सी यूरिया के उपयोग से भी ठीक नहीं हो रहा है।</p> <p style="text-align: justify;">• 2 या 3 साल से कम उम्र के बच्चे जिनमें पूर्व में स्पलीन में खून के रूक जाने की घटना हुई है तथा उनके स्प्लीन को शल्य चिकित्सा से निकालने की प्रक्रिया की जाना है।</p> <p style="text-align: justify;">• गर्भावस्था में।</p> <h3 style="text-align: justify;">रक्ताधान से संबंधित खतरा</h3> <ul> <li style="text-align: justify;">एलोइम्युनाईजेसन तथा विलंब में होनें वाले हीमोलिटिक घटनायें।</li> <li style="text-align: justify;">शरीर में लौह तत्व का अधिभार-चिलेशनथेरेपी उन मरीजों के लिए प्रस्तावित है, जिन्होनें कम से कम 20 बार ट्रान्सफ्यूजन कराया है तथा लीवर में लौह तत्व की मात्रा 7 मि.ग्रा/ग्राम है, (मानक एम.आर.आई की जांच के द्वारा मापी गई)।</li> <li style="text-align: justify;">संक्रमण</li> <li style="text-align: justify;">सेन्ट्रल वीनस केथेटर से संबंधित जटिलताएं, यदि वे उपयोग की गई है।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">नियमित रूप से ट्रान्सफ्यूजन प्राप्त करने वाले सिकिल सेल के मरीजों के लिए रक्त की मात्रा एवं गुणवत्ता, थैलेसीमिया के मरीजों के उपयोग में लाये गये जाने वाले रक्त के जैसी ही हो।</p> <p style="text-align: justify;">लौह तत्व का अधिभार एवं उसे निष्क्रिय करने की प्रक्रिया शरीर के लौह तत्व का अधिभार प्रमुख तौर पर ट्रान्सफ्यूजन किये गये रक्त की मात्रा पर निर्भर करता है। अतः हीमोग्लोबिन के विकारों से ग्रसित मरीजों में लौह तत्व के अधिभार का मापन अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि गंभीर रूप से एनिमिया स्वयः ही आंतों से भोजन में उपस्थिति लौह तत्व के अवशोषण को प्रेरित करता है, जो कि पुनः शरीर में लौह तत्व के भार को बढ़ा देता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">लौह तत्व भार की मोनिटरिंग</h3> <p style="text-align: justify;">1. सीरम फिरेटिन</p> <p style="text-align: justify;">यह एक सस्ती व सरल जांच है। क्रोनिक इन्फ्लेमेंशन एवं लीवर संबंधित बिमारियां इस पैमाने को प्रभावित करती है। प्रत्येक 3 से 6 माह सीरम फेरेटिन की जांच की जानी चाहिए। लौह तत्व को निष्क्रिय करने की प्रक्रिया इस तरह से की जानी चाहिए की इसकी मात्रा 2500 एमजी /लीटर से कम रहें। (आदर्श तौर पर 1000 एमजी /लीटर से कम)</p> <p style="text-align: justify;">2. लीवर में लौह तत्व का कंसेंट्रेसन</p> <p style="text-align: justify;">इसकी मात्रा लीवर बायोप्सी या फिर एम.आर.आई के माध्यम से की जा सकती है। यह पैमाना शरीर के पूर्ण लौह तत्व अधिभार को दर्शाता है तथा इसकी जांच वर्ष में एक बार की जानी चाहिए। इसकी मात्रा 5 मि.ग्रा0/ग्राम या उससे कम हो तथा किसी भी अवस्था में 7 मि. ग्रा0/ग्राम से अधिक ना हो।</p> <h3 style="text-align: justify;">ह्रदय में लौह तत्व</h3> <p style="text-align: justify;">इसकी जांच क्रार्डियक एम.आर.आई टी-2 द्वारा की जाती है, 20 उे से कम वैल्यू है तो वो ह्रदय पर अधिभार को दर्शाता है तथा एल.वी (लेफ्ट वेंटेरीकूलर) की कार्यक्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। अतः ऐसे मरीजों में लौह तत्व का निष्क्रिय करने का प्रभावशाली तरीका उपयोग में लाया जाना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">सामान्य दिशा-निर्देश</span></h3> <p style="text-align: justify;">सिकिल सेल डिजीस के मरीजों के लिए सामान्य दिशा-निर्देश</p> <p style="text-align: justify;">सिकिलसेल बीमारी वाले व्यक्ति को निम्नलिखित सावधानियां रखना फायदेमंद होता हैः-</p> <ol style="text-align: justify;"> <li>ऐसा मरीज यदि खूब पानी पिए तो उसका रक्त पतला होने के कारण लाल रक्त कणों के हॅसिए के आकार में परिवर्तन की संभावना कम हो जाती है। उल्टी, दस्त का तुरन्त इलाज किया जाना चाहिए।</li> <li>ऐसे मरीज को चाहिए कि वह ज्यादा भाग-दौड़ तथा शारीरिक मेंहनत के काम न करें, क्योंकि यदि वह व्यक्ति कम समय में अधिक मेंहनत या खेल-कूद करेगा, तो उसके शरीर में आक्सीजन की कमी हो जाएगी।</li> <li>चूकिं पहाड़ों पर आक्सीजन की कमी होती है, अतः ऐसे व्यक्ति को चाहिए कि वो ऊँचे पहांड़ो पर न जाए।</li> <li>ज्यादा ठंड से ऐसे व्यक्ति को बचना चाहिए, क्योंकि यदि वातावरण ठंडा है तो हमारी त्वचा की छोटी रक्त नलिकाएं सिकुड़ जाती है, इससे रक्त का प्रवाह अवरुद्ध होता है।</li> <li>यदि शरीर में सक्रंमण हो तो उसका तुरन्त इलाज किया जाना चाहिए।</li> </ol> <h3 style="text-align: justify;">जिला स्तर पर किये जाने वाले कार्य</h3> <ol style="text-align: justify;"> <li>जिला अस्पताल में सिकलसेल क्लीनिक स्थापित करना।</li> <li>जिला स्तर पर सिकलसेल डिसीज को डायग्नोज़ करना एवं प्रभावितों को इलाज उपलब्ध कराना।</li> <li>जिले के सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र जहां पर माइक्रोस्कोप उपलब्ध है वहां पर वृहत्‌ स्क्रीनिंग कर सिकिलिंग टेस्ट करना।</li> <li>ए.एन.सी क्लीनिक में आने वाली सभी गर्भवती महिलाओं की स्क्रीनिंग कर सिकलसेल हीमोग्लोबिन तथा बीटा थैलेसीमिया ट्रेट का परीक्षण करना। हाईरिस्क शादी-शुदा व्यक्तियों में बीमारी हेतु काउंसिल करना तथा जागरूकता लाना।</li> <li>सिकलसेल डिसीज के डायग्नोसिस हेतु जिले के सभी चिकित्सा अधिकारियों एवं लेबोरेटरी तकनीशियन का प्रशिक्षण किया जाना।</li> <li>सिकलसेल डिसीज के प्रभावितों के अभिभावकों को रोकथाम, स्वास्थ्य शिक्षा एवं स्वास्थ्य की देखभाल हेतु प्रशिक्षण देना।</li> <li>जिला स्तर पर, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र स्तर पर प्रचार-प्रसार, स्वास्थ्य शिक्षा एवं जन-जागरूकता हेतु व्यापक अभियान आरंभ करना।</li> </ol> <p style="text-align: justify;">स्रोत: लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग,मध्य प्रदेश सरकार|</p>