भूमिका थैलेसीमिया भारतवर्ष में सबसे अधिक पाया जाने वाला अनुवांशिक रोग हैं। इस रोग में रक्त के घटक सामान्य हीमोग्लोबिन, जो शरीर में आक्सीजन का संचार करता है, उसके स्थान पर विकृत हीमोग्लोबिन का सृजन होता है, जिसके कारण लाल रक्त कण की आयु जो साधारणतः 110-120 दिन होती है, घटकर 10-15 दिन मात्र रह जाती है, जिससे खून की कमी होती है। इसके कारण ग्रसित बच्चे में शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पाता है। थैलेसीमिया के प्रकार अल्फा, बीटा, डेल्टा थैलेसीमिया- इन तीनों में बीटा थैलेसीमिया अधिक होता है। बीटा थैलेसीमिया दो प्रकार का होता है- थैलेसीमिया मेंजर थैलेसीमिया माइनर (ट्रेट) यह रोग भूमध्य सागर के आस-पास के देशों में व्याप्त है। विश्व में इसके लगभग 24 करोड केरियर है। भारतवर्ष में सिकन्दर के आकम्रण तथा अरबों के आगमन से सिंध, मुलतान, पंजाब तथा गुजरात में यह विकार उत्पन्न हुआ फिर भारत में कई जगह फैला। भारतवर्ष में इसके लगभग 3 करोड केरियर है तथा सिंधी,पंजाबी, गुजराती, हिन्दु तथा मुस्लिम मुखय ग्रसित समुदाय है। अनुमान है कि भारतवर्ष में थैलेसीमिया ग्रसित लगभग 20000-25000 बच्चे प्रतिवर्ष पैदा हाते प्रदेश में अभी तक ऐसा कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ है लेकिन अनुमानतः लगभग 800-1000 थैलेसीमिया से ग्रसित बच्चों का जन्म प्रदेश में प्रतिवर्ष होता है, जिनकी सबसे अधिक संखया इंदौर, भोपाल तथा ग्वालियर में है। थैलेसीमिया की अनुवांशिकता थैलेसीमिया से पीड़ित व्यक्ति में निम्न लक्षण हो सकते हैं- शारीरिक विकास में कमी- बच्चों में एनीमिया के कारण शारीरिक विकास काफी धीमा होता है। इस कारण से किशोरावस्था भी देरी से आती है। इन्फेक्शन -थैलेसीमिया रोगियों में अक्सर इन्फेक्शन का जोखिम बना रहता है। अस्थियों में विकार - थैलेसीमिया में बोन मेंरो में फैलाव के कारण हडि्डयों में भी इसका असर होता है। जिस कारण से हडि्डयों में विशेषकर चेहरें एवं सिर के हडि्डयों में असमान्य उभार आ जाते है। बोन मेंरो में फैलाव के कारण हडि्डयां पतली एवं शीघ्र टूटने वाली हो जाती है। जिसके कारण से हडि्डयों में फ्रैक्चर होते है। तिल्ली का बढ़ जाना -लाल रक्त कणों की कोशिकाएं टूटने से तिल्ली के उपर अधिक भार पड़ता है। जिसके कारण से इसमें आसमान्य रूप से वृद्धि होती है। बढी हुई तिल्ली से खून की कमी और अधिक हो जाती है। रक्ताधान करने पर लाल रक्त कोशिका भी टूटती है। अतः तिल्ली की अत्यधिक वृद्धि में इसे निकालना आवश्यक हो जाता है। थैलेसीमिया के रोगियों में लौह तत्व शरीर में जमा हो जाते है और बार-बार रक्त चढा़ ने पर अनावश्यक लौह तत्व जमा होते है। अधिक मात्रा में लौह तत्व जमा होने पर इसका दुष्प्रभाव ह्रदय, लीवर एवं एण्डोक्राइन ग्लैन्डस पर पड़ता है। अतः लौह तत्व के अधिक जमाव को रोकने के लिए चिलेशन थैरेपी आवश्यक हो जाती है। थैलेसीमिया का निदान सस्ती/त्वरित प्रक्रियाएँ नेस्टरोफ्ट(नेकेड आई सिंगल टयूब ओस्मोटिक फ्राजईलिटी टेस्ट) इस प्रक्रिया की 94 प्रतिशत संवेदनशीलता है तथा इसका परिणाम आयरन की कमी से प्रभावित हो सकता है। हीमोग्लोबिन संबंधी सूचकांक- एमसीएच, एमसीभी हीमोग्लोबिन के घटको को निम्न पद्धति यों से पृथक करना- जिससे विभिन्न प्रकार के हीमोग्लोबिन मुख्यतः एचबीए2 एचबीएफ को पहचाना एवं परिमाणित किया जा सके- इलोक्ट्रोफोरेसिस- हाईवोल्टेज इलेक्ट्रोफोरेमिस आइसोइलेक्ट्रिक फोकसिंग एचपीएलसी मालिक्यूलर जांचें जैसे कि डीएनए विशलेषण। थैलेसीमिया के मरीजों के उपचार के लिए निम्नलिखित उपचार उपलब्ध है- मरीज में रक्त की अधिक कमी होने के कारण प्रत्येक 15 दिवस से 2 माह के भीतर रक्ताधान की आवश्यकता होती है। लौह तत्व की अधिकता के लिए आयरन चिलेटर उपयोग में लाये जाते है। कुछ मरीजों में तिल्ली को भी निकालने की आवश्यकता पड़ सकती है। जिनमें संभव हो उनमें बोनमैरो ट्रांसप्लांटेशन किया जा सकता है। यह उपचार विकल्प अत्यधिक प्रभावशाली हैं, परन्तु यह एक खर्चीली प्रक्रिया है। चूकिं थैलेसीमिया के मरीजों में नियमित रक्ताधान एक महत्वपूर्ण उपचार पद्धति है। अतः इन मरीजों में रक्ताधान से संबंधित महत्वपूर्ण बिन्दु इस प्रकार है- बीटा थैलेसीमिया मेंजर, रक्ताधान आश्रित थैलेसीमिया मेंजर रक्ताधान कब शुरू करें ? हीमोग्लोबिन 7 ग्राम :ए जिसे दो सप्ताह के अंतराल पर दो बार जांचा गया हो, या अप्रभावी रेड सेल का उत्पादन होने के संकेत मिल रहे हो, जैसे किः- हड्डियों में विकार उत्पन्न होना। (माथे की हडि्डयों में उभार आना) मंद शारीरिक विकास। शरीर में गठाने उभरना। ट्रान्सफ्यूजन की आवृत्ति इस तरह से नियंत्रित हो कि हीमोग्लोबिन स्तर 9 ग्राम %से अधिक रहें।उपरोक्त क्रिया का उद्देश्य बोन मैरो की अत्यधिक क्रियाशीलता को नियंत्रित करने के लिए है। जिससे हड्डियों पर दबाव कम होगा, उनका विकास होगा एवं शारीरिक क्रियाशीलता बनी रहेगी। ट्रान्सफ्यूजन के उपरान्त हीमोग्लोबिन स्तर 12 ग्राम % से अधिक नहीं होना चाहिए। 2. किस गुणवत्ता का रक्त होने चाहिए ? दान किया हुआ रक्त स्वैच्छिक रक्त दाता का होना चाहिए जो कि रक्तदान के लिए स्वीकृत मापदण्डों को पूर्ण करता हो। वे संस्थायें जो कि रक्त एवं रक्त उत्पादों के पृथककरण एवं रख-रखाव के लिए राष्ट्रीय मापदण्डों का पालन करती हो। रक्त की जांच एच.आई.वी., हीपेटाइटिस-बी एवं सी, सिफीलीस, मलेरिया या अन्य संक्रामक कारकों के लिए अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए| वे मरीज जिनमें ट्रान्सफ्यूजन किया जाना है उन्हें एबीओ तथा आर एच काम्पेटिबल रक्त देना है। प्रत्येक ट्रान्सफ्यूजन के पूर्व रक्त की पूर्ण क्रांसमेंचिंग की जानी चाहिए एवं किसी भी नई एन्टीबॉडी के लिए भी जांच की जानी चाहिए। फर्स्ट डिग्री रिलेटिव्स से ट्रान्सफ्यूजन के लिए रक्त नहीं लिया जाए क्योंकि इससे उत्पन्न होने वाले एन्टीबॉडीस से बोनमैरो ट्रांसप्लांटेशन के परिणाम प्रभावित होते है। रक्त में से श्वेत रक्त कणिकाओं को पृथक (ल्यूकोफिल्ट्र्रेशन) कर लेना चाहिए। श्वेत रक्त कणिकाओं को पृथक करने की प्रक्रिया यथासंभव भंडारण पूर्व की जानी चाहिए, परन्तु इस प्रक्रिया को ब्लड बैकों में या बेड साइड पर करना भी मान्य है। इसके लिए ल्यूकोसाइट फिल्टर का उपयोग किया जाता है। वासड लाल रक्त कण उन मरीजों में उपयोगी है जो कि प्लाज्मा प्रोटींस के लिए गंभीर रूप से एलर्जिक है। प्रत्येक ट्रान्सफ्यूजन का रिकार्ड सावधानी पूर्वक रखा जाना चाहिए। जिसमें की रक्त की मात्रा व ट्रान्सफ्यूजन से उत्पन्न दुष्प्रभाव, वार्षिक रक्त की आवश्यकता इत्यादि की जानकारी सम्मिलित हो। एन्टीजन जैसे कि सीई और केल का भी मिलान आवश्यक है। रक्ताधान गैर आश्रित थैलेसीमिया या थैलेसीमिया माइनर इस चिकित्सकीय परिस्थिति में रक्ताधान की आवश्यकता कभी-कभी ही रहती है- जैसे कि हीमोग्लोबिन में अचानक गिरावट आना जो कि रक्तस्त्राव, सर्जरी या किसी संक्रमण की वजह से संभव हो सकता है। गर्भावस्था के दौरान भी ट्रान्सफ्यूजन की आवश्यकता पड़ सकती है। नियमित ट्रान्सफ्यूजन की निम्न परिस्थितियों में अनुशंसा की जाती हैः- शरीर का अल्प विकास होना मुख्यतः लम्बाई का धीमा विकास भारी कार्य करने में अक्षमता स्प्लीन की अत्यधिक गतिविधि जिससे की हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाती है एवं गंभीर अवस्था में प्लेटलेट व श्वेत रक्त कण भी कम होने लगते है। हड्डियों में उल्लेखनीय विकृतियां उत्पन्न होना। बार-बार लाल रक्त कणों के टूटने से संकट उत्पन्न होना| पल्मोनरी उच्च रक्तचाप। उच्च जोखिम (हाई रिस्क ) मामलों की रोकथाम तथा थ्रोम्बोटिक या सेरेब्रोवस् बिमारी का इलाज। एक्स्ट्रामेंडुलरी मासेस पैरो पर अल्सर रक्ताधान से जुड़े जोखिम उपरोक्त स्थितियों में शरीर में लौह तत्वों का अधिभार ट्रान्सफ्यूजन प्रारम्भ करने के पूर्व भी हो सकता है। परन्तु ट्रान्सफ्यूजन से लौह तत्व का अधिभार प्रभावशाली तरीके से बढ़ सकता है। अतः ऐसे मरीजों की प्रत्येक 3 माह से 6 माह में नियमित रूप से मॉनिट्रिंग की जानी चाहिए, तथा लौह तत्व को शरीर से निकालने की प्रक्रिया उसके अघिभार की मात्रा के अनुसार शुरू कर देनी चाहिए। इन रोगियों का प्रत्येक 3 से 6 माह में लीवर तथा किडनी फंक्शन टेस्ट भी होना चाहिए। ऐसे मरीजों के शरीर में विभिन्न प्रकार की एंटीबॉडिज बनने का खतरा रहता है, गर्भवती महिलाओं व स्पलीन रहित मरीजों में खतरा और भी बढ़ जाता है। अतः रक्त के एंटीजन का विस्तारपूर्वक मैचिंग किया जाना अत्यन्त आवश्यक है। थैलेसीमिया में लौह तत्व के अधिभार की मोनिटरिंग तथा लौह तत्व को निष्क्रिय करने की प्रक्रिया - लौह तत्व अधिभार की मोनिटरिंग सीरम फिरेटिन यह जांच प्रत्येक 2 से 3 माह में की जानी चाहिए। यह पाया गया कि स्पॉट फेरेटिन लेवल लौह तत्व के भार की मात्रा का सही आंकलन नहीं कर पाता है। अतः यह आवश्यक है कि ट्रान्सफेरीन सेचुरेशन जांच भी की जाना चाहिए। लीवर आयरन सांद्रता (एलआईसी ) लीवर में लौह तत्व का आंकलन एम.आर.आई के माध्यम से किया जा सकता है परन्तु यह जांच आसानी से उपलब्ध नहीं होती है। यदि यह जांच उपलब्ध है तो प्रति 2 वर्ष में यह जांच की जानी चाहिए। कॉर्डियक आयरन एम.आर.आई-टी2 के माध्यम से ह्रदय में लौह तत्व का आंकलन किया जा सकता है। यह भी एक मंहगी जांच है। हालांकि अधिक उम्र के मरीजों के लिए यह एक उपयोगी जांच है। रक्ताधान आश्रित थैलेसीमिया में लौह तत्व चीलेशन आयरन चिलेशन का उद्देश्य अधिक मात्रा में लौह तत्व को शरीर से निष्क्रिय करना है ताकि लौह तत्व के घातक घटकों का निर्माण ना हो। इससे शरीर के अंगों मुख्यतः-ह्रदय, लीवर तथा ग्रंथियों का बचाव संभव होगा। वर्तमान समय में तीन आयरन चिलेटिंग औषधियां मान्य की गई है। डेस्फेरियोक्सामीन डेफेरीप्रोन डेफिरासिरोक्स इन औषधियों को निर्माण करने के लिए भारत में बहुतायात में निर्माता है, इन ब्रान्डस की गुणवत्ता एवं प्रभावशीलता की जांच अत्यन्त आवश्यक है। डेस्फेरियोक्सामीन - यह औषधि सबक्युटेनियस (एस सी ) या इन्ट्राविनस (आई वी) माध्यम से 8 से 12 घंटे के लिए दी जाती हैं। जहां पर अधिक प्रभावशाली ढंग से लौह तत्व को निष्क्रिय करने की आवश्यकता होती है वहां 24 घंटे के लिए इन्ट्राविनस उपचार किया जाता है। डोजेज-20-40 मिली.ग्राम बच्चों के लिए एवं 40 से 60 मिली.ग्राम वयस्को के लिए। बच्चो में इस औषधि का उपयोग 10 से 20 बार ट्रान्सफ्यूजन करने के उपरान्त किया जाता है या जब फिरेटिन लेवल 1000 एमजीएम/लीटर से अधिक हो जायें। विटामिन –सी डेस्फेरियोक्सामीन की लौह तत्व के निष्क्रिय करने की क्षमता को बढा़ ता है, विटामिन-सी का डोज 2 से 3 मिली.ग्राम/कि.ग्रा./दिन से अधिक नहीं होना चाहिए, क्योंकि अधिक मात्रा में विटामिन-सी लौह के हानिकारक प्रभाव को बढा़ देता है। डेफेरीप्रोन यह औषधि 6 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के लिए मान्य है। यह टेबलेट के रूप में उपलब्ध है। डोज 75-100 मिली.ग्राम/कि.ग्रा./दिन तीन भागों में विभाजित कर के दी जाती है। इस औषधि का सबसे घातक दुष्प्रभाव श्वेतरक्त कणिका पर होता है, जैसे कि संखया में गिरावट आना, जो कि कभी-कभी एग्रेन्यूलोसाइटोसीस के स्तर तक पहुंच सकती है जिसकी वजह से गंभीर संक्रामक रोग संभव हो सकती है। इस वजह से श्वेत रक्त कणिकाओं की गणना प्रत्येंक एक से दो सप्ताह में की जानी चाहिए तथा इसकी संखया कम होने पर इस औषधि को बंद कर देना चाहिए। अन्य दुष्प्रभाव जैसे कि ह्रड्डी के जोड़ों में दर्द होना। लीवर, किडनी फंक्शन टेस्ट प्रत्येक माह में किये जाने चाहिए। डेफेरीप्रोन और डेफिरासिरोक्स-एक साथ उपयोग करने पर अधिक प्रभावशाली ढंग से चिलेशन कराती है। डेफिरासिरोक्स यह औषधि 2 साल से अधिक उम्र के बच्चों के लिए मान्य है। यह भी डेफेरीप्रोन की तरह टेबलेट के रूप में उपलब्ध है। प्रारम्भिक डोज- बच्चों में 20 मिली.ग्राम/कि.ग्रा./दिन (जिसे 40 मिली.ग्राम/कि.ग्रा./दिन तक बढ़ाया जा सकता है)। इस औषधि का दुष्प्रभाव गुर्दे व लीवर पर पड़ सकता है, यह दुष्प्रभाव ज्यादा घातक नहीं होते है। परन्तु यह औषधि गुर्दे या लीवर की खराबी की अवस्था में कदाचित भी इस्तेमाल नहीं की जानी चाहिए। गुर्दे व लीवर के क्रियाशीलता की जांच प्रत्येक माह आवश्यक है। रक्ताधान गैर आश्रित थैलेसीमिया (एन टी डी टी ) के मरीजों में लौह तत्व चीलेशन इस उद्देश्य के लिए दो औषधियों को मान्य किया गया हैः- डेस्फेरियोक्सामीन और डेफिरासिरोक्स जब सीरम फिरेटिन 800 एमजीएम/लीटर से अधिक हो जाए तब लौह तत्व को निष्क्रिय करने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए। प्रारम्भिक डोज 10 मिली.ग्राम/कि.ग्रा./दिन है जो कि 20 मिली.ग्राम/कि.ग्रा./दिन तक बढ़ायी जा सकती हैं, यदि फिरेटिन लेवल 1500-2000 एमजीएम/लीटर या अधिक हो। भोजन के साथ चाय पीने से लौह अवशोषण कम होता है। बचाव एवं सावधानियां जिन जन समूहों में थैलेसीमिया के होने की संम्भावना अधिक है उनमें थैलेसीमिया ट्रेट का पता लगाने के लिए एचबीए2 एवं अन्य स्क्रीनिंग जाँच महिला एवं पुरूष दोनो में करानी चाहिए। स्क्रीनिंग प्रक्रिया से जिन व्यक्तियों या दंपत्तियों में थैलेसीमिया के लिए वाहक होने का संकेत मिला है उनके लिए जेनेटिक परामर्श अत्यन्त आवश्यक है। प्रसव पूर्व क्लीनिक में थैलेसीमिया के लिए वाहक महिलाओं को अपने पति की भी जांच कराने का सुझाव देना चाहिए। रिस्क दम्पत्तियों को परामर्श देने वाला व्यक्ति एक प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी होना चाहिए, जो कि परामर्श देने में सक्षम हो तथा उसे हीमोग्लोबिन विकारों की गहन जानकारी है। ऐसे स्वास्थ्य कर्मी को निम्न कार्य करने चाहिएः- स्क्रीनिंग के परिणामों की व्याखया करनी चाहिए तथा विभिन्न प्रकार के हीमोग्लोबिन की मौजूदगी की क्या चिकित्सकीय महत्ता है, उस पर भी चर्चा की जानी चाहिए। परामर्शदाता को सुनिश्चित करना चाहिए कि एट रिस्क दम्पत्ती हीमोग्लोबिन विकारों के दुष्प्रभावों को भली-भांति समझ गए है। उदाहरण के तौर पर यदि बिमारी की संभावना 25 प्रतिशत है तो यह नहीं समझा जाना चाहिए कि अगर एक संतान प्रभावित हो गई है तो बाकी तीन संताने प्रभावित नहीं होगी। परामर्शदाता को रोकथाम संबंधी विकल्पों तथा इन विकल्पों के लाभ एवं हानि को भी समझाना चाहिए। परामर्श दाता को सूचनाप्रद होना चाहिए परन्तु दंपंत्तियों को विकल्प का चुनाव करने की स्वायत्ता होनी चाहिए। परामर्श दाता को दम्पत्तियों द्वारा चयनित विकल्प के प्रति सहायक होना चाहिए। दम्पत्तियों को परामर्श के लिए दूसरी बार भी बुलाना चाहिए चूकिं पहली बार के परामर्श से लिए गए निर्णय चिंता तथा भावना से प्रभावित हो सकते है। दिशा-निर्देश हीमोग्लोबिन संबंधी विकारों के रोकथाम कार्यक्रमों के लिए संक्षिप्त दिशा-निर्देश हीमोग्लोबिन संबंधी विकारों के रोकथाम कार्यक्रम के महत्वपूर्ण तथ्य- जन जागरूकता स्क्रीनिंग की उपलब्धता हीमोग्लोबिन विकारों के वाहकों के लिए जिनेटिक परामर्श की उपलब्धता। जन जागरूकता अभियान एवं स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य थैलेसीमिया एवं सिकल सेल एनिमिया जैसी बिमारियों तथा इन बिमारियों के दुष्परिणामों की जानकारी दी जानी चाहिए। इन बिमारियों के इलाज उपलब्ध होने की जानकारी भी आम जनता को होनी चाहिए। लोगों को इन बिमारियों की रोकथाम की जानकारी होनी चाहिए, जिसके लिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि वाहकों की पहचान की जाए एवं उन्हें जिनेटिक परामर्श दिया जाए। हीमोग्लोबिन विकारों के वाहक एवं दंपत्तियों को उनके होने वाली इन बिमारियों के होने की संभावना की जानकारी होनी चाहिए। आम जनता को जागरूक करना चाहिए कि इन बिमारियों के लिए वाहक होना कोई कलंक नहीं है। स्रोत: लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग,मध्य प्रदेश सरकार।