भूमिका सिंहासन करते समय शरीर का आकार सिंह / लायन के समान होने के कारण इसे सिंहासन या लायन पोज कहा जाता हैं। सिंहासन योग के इतने लाभ है की इसे सर्व रोगहर आसन भी कहा जाता हैं। इस आसन से चेहरी की झुर्रियां दूर होती है इसलिए इसके एंटी-एजिंग गुणों का लाभ लेने के लिए इसे रोज सुबह अवश्य करना चाहिए। सिंहासन योग विधि सबसे पहले एक स्वच्छ और समतल जगह पर एक दरी / चटाई बिछा दे। अब वज्रासन में बैठ जाए। अब घुटनों को जितना हो सकें उतना दूरी पर रखे। अब अपने दोनों हाथों को दोनों घुटनों के बीच इस तरह रखे की दोनों हाथों की उंगलियाँ आपके शरीर की तरफ रहें। दोनों हाथों को सीधा रख आगे की ओर झुके। सिर को पीछे की ओर रखकर जितना हो सके उतना मुंह खोलिए। जीभ / टंग को बाहर निकालिए। आँखों को खोलकर भूमध्य (दोनों ऑयब्रोस के बीच माथे / फॉरहेड के मध्य की ओर देखे। अब नाक से श्वास अंदर लेकर मुंह से धीरे-धीरे आवाज निकालते हुए श्वास बाहर छोड़े। स्वस्थ व्यक्ति ने इसे 10 बार रोज करना चाहिए। रोगी व्यक्ति कम से कम 15 से 30 बार करे। अगर किसी कारणवश आप वज्रासन में नहीं बैठ सकते है तो इस आसान को खुर्ची पर बैठ कर भी कर सकते हैं। आसन के अंत में फिर से वज्रासन में थोड़ी देर बैठ जाये और बाद में 5 मिनट शवासन करे। सिंहासन के लाभ कान, नाक और गले के रोग से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह श्रेष्ठ आसन हैं। जो बच्चे हकलाकर बोलते है उन्होंने यह आसन अवश्य करना चाहिए। इस आसन से वाणी मधुर और स्पष्ट होती हैं। अस्थमा के रोगियों में यह विशेष लाभकर हैं। शरीर में प्राणवायु / ऑक्सीजन का संचारण ठीक से होता हैं। मेरुदंड / स्पाइन लचीला और मजबूत होता हैं। मुंह की दुर्गन्ध उर करने के लिए यह उपयोगी आसन हैं। सिंहासन के और भी कुछ अन्य प्रकार है परन्तु यहाँ पर सबसे सरल और उपयोगी प्रकार की जानकारी दी गयी हैं। सिंहासन करने के ऐसे तो कोई विशेष सावधानी नहीं है पर अगर यह आसन करते समय आपको यदि कोई परेशानी होती है तो योग चिकित्सक की राय जरुर लेना चाहिए। लेखक: डॉ. परितोष त्रिवेदी स्रोत: निरोगिकाया