शारीरिक स्थिति कोई भी ध्यानात्मक आसन जैसे सुखासन/पद्मासन/वज्रासन आदि अभ्यास विधि सर्वप्रथम किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएं। आंखे बंद करके पूरे शरीर को शिथिल कर लें। दोनों नासिकारंध्रों से गहरी सांस लें और वक्ष स्थल को फैलाएँ। दोनों नथुनों से गहरी श्वास अंदर खींचते हुए वक्ष को फुलाएं। उदर की मांसपेशियों को दबाव पूर्वक अन्दर बाहर करते हुए श्वास छोड़ें और ग्रहण करें सक्रियता पूर्वक श्वास बाहर छोड़ना एवं निष्क्रियता पूर्वक उच्छ्वास करना चाहिए। कम से कम तीव्र श्वास के 30 चक्र पूरा करना चाहिए। सके बाद गहरी श्वास अंदर लेते हुए धीरे-धीरे बाहर छोड़ें। इस तरह कपालभाति का एक चक्र पूरा होता है। इसी प्रकार प्रत्येक चक्र पूरा करने के बाद गहरी श्वास लेनी चाहिए। इस अभ्यास को कम से कम दो बार और दोहराना चाहिए। श्वसन क्रिया यह शवसन क्रिया उदर की मांसपेशियों के सहयोग से बिना किसी अतिरिक्त दबाव के होनी चाहिए। शवास बाहर छोड़ने की क्रिया वक्ष एवं कधा क्षेत्र में बिना किसी अनुचित दबाव अथवा गतिविधि के होनी चाहिए। पूरे अभ्यास के समय श्वास–उच्छ्वास सहज रूप से होना चाहिए। अभ्यास की चक्र संख्या प्रारंभिक अवस्था में 3 चक्र तक अभ्यास कर सकते हैं। प्रत्येक चक्र में 20 श्वासोच्छवास संख्या होनी चाहिए। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाया जा सकता हैं। लाभ कपालभाति कपाल को शुद्ध करता है कफ विकारों को समाप्त करता है। यह जुकाम, साइनोसाइटिस, अस्थमा एवं श्वास नली संबंधी संक्रमणों में लाभदायक है। यह पूरे शरीर का कायाकल्प करता है और चेहरे को सुकोमल और दीप्तिमान बनाए रखता है। यह तंत्रिका तंत्र को संतुलित कर शक्तिशाली बनाता है साथ ही साथ पाचन तंत्र को शक्तिशाली बनाता है। सावधानियां हृदय संबंधी व्याधियों में, चक्कर आने, उच्च रक्तचाप, नासिका से रक्त प्रवाह, मिरगी, माइग्रेनस्ट्रोक, हर्निया एवं गैस्ट्रिक अल्सर होने की स्थिति में इस अभ्यास को नहीं करना चाहिए। स्त्रोत : आर्येुवेद,योग व प्राकृतिक चिकित्सा,यूनानी,सिद्ध एवं होम्योपैथी(आयुष),मंत्रालय, भारत सरकार।